दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

सबरिमला में महिलाओं के प्रवेश पर एससी की सुनवाई की मुख्य बातें: सॉलिसिटर जनरल का बयान – ‘संवैधानिक नैतिकता’ न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकती

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यों की संविधान पीठ ने केरल स्थित सबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई की है। इस ऐतिहासिक मामले में मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली पीठ ने शुक्रवार को महिलाओं के धार्मिक स्थलों पर भेदभाव से जुड़ी दिक्कतों पर गहराई से विचार किया।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि संविधान की नैतिकता को न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थानों में जाकर महिलाओं का प्रवेश बहस का विषय नहीं होना चाहिए, खासतौर पर तब जब परंपराओं से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना आवश्यक हो।

सबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा यह मुद्दा पिछले कई वर्षों से देश में सामाजिक और कानूनी चर्चा का विषय रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सदियों पुराने प्रतिबंध को हटाने का आदेश दिया था, लेकिन इसके बाद भी इस फैसले का पूरी तरह से पालन नहीं हुआ। इस कारण से अदालत में यह याचिकाएं दायर की गईं कि क्या महिलाओं के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना संविधान के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

पीठ ने इस मामले में हर पक्ष की दलीलों को ध्यान से सुना और महिलाओं के धार्मिक अधिकारों तथा साथ ही मंदिर की परंपराओं के संरक्षण दोनों पक्षों के संतुलन की जरूरत पर बल दिया। न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि न्यायालय को धार्मिक स्थलों के मामलों में संवेदनशीलता बरतनी होगी और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना प्राथमिकता होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान कई वरिष्ठ वकीलों और धार्मिक प्रतिनिधियों ने भी अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने अपने-अपने नजरिए से यह बताया कि संसदीय लोकतंत्र में धार्मिक प्रथाओं के प्रति न्यायालय को किस तरह सावधानी बरतनी चाहिए। इस बहस ने पूरे देश में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वायत्तता के बीच संतुलन पर एक नया विमर्श शुरू किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल केरल का, बल्कि पूरे देश के धार्मिक स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश एवं समानता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की पुष्टि करते हुए साथ ही परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के प्रति भी संवेदनशीलता दिखाएगा।

अधिकारियों ने बताया कि आगामी सुनवाई में न्यायालय इस बात पर ध्यान देगा कि कैसे संविधान के प्रमुख सिद्धांतों के साथ धार्मिक स्वतंत्रता का सामंजस्य बैठाया जाए। यह मामला भारतीय समाज में महिलाओं और धार्मिक संस्थाओं के बीच एक नए संवाद की शुरुआत भी माना जा रहा है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!