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संस्कृत को तीन-भाषा सूत्र में शामिल करने के खिलाफ मामला

A case against offering Sanskrit as part of the three-language formula

उत्तर भारत के कई राज्यों में शिक्षा व्यवस्था में तीन-भाषा सूत्र को लागू करना एक विवादास्पद विषय बना हुआ है। विशेषकर इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि स्कूलों में दक्षिण भारत की क्षेत्रीय भाषाएं क्यों नहीं पढ़ाई जातीं, जबकि संस्कृत को ज़ोर देकर शामिल किया जाता है। इस विषय पर नीति निर्धारकों, शिक्षाविदों और जनसाधारण के बीच गहन बहस जारी है।

तीन-भाषा सूत्र के तहत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है – एक मातृभाषा, एक राष्ट्रव्यापी भाषा (अक्सर हिंदी या अंग्रेजी) और एक अन्य क्षेत्रीय भाषा। उत्तर भारत के कई राज्यों ने इस सूत्र के अंतर्गत संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में प्राथमिकता दी है। हालांकि, दक्षिण भारत के राज्यों में इस सूत्र को लागू करते हुए उनकी क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जाती है।

उत्तर भारत के कुछ राज्यों में इस बात पर जोर दिया जाता है कि संस्कृत भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मूल है, इसलिए इसे पढ़ाना आवश्यक है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि संस्कृत के बजाय दक्षिण भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम को पढ़ाना बेहतर होगा क्योंकि इससे छात्रों को दक्षिण भारत के सांस्कृतिक और भाषाई विविधता की समझ बढ़ेगी और देश के एकीकरण में सहायता मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा का चयन क्षेत्रीय सांस्कृतिक अखंडता और संवाद को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण से होना चाहिए। जब उत्तर भारतीय छात्र दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखेंगे, तो इससे दो क्षेत्रीय समुदायों के बीच सांस्कृतिक पुल बनेंगे और अलगाव की भावना कम होगी। इसके अलावा, रोजगार और सामाजिक गतिशीलता को भी लाभ होगा क्योंकि भाषा सीखना संवाद एवं व्यापार को सुगम बनाता है।

सरकार की ओर से इस विषय पर अभी तक कोई व्यापक बदलाव नहीं आया है, लेकिन शिक्षा मंत्रियों और नीति निर्माताओं के बीच प्रयास हो रहे हैं कि तीन-भाषा सूत्र को पूरी तरह व्यावहारिक और समावेशी बनाया जाए। शिक्षाविदों का सुझाव है कि शिक्षक प्रशिक्षण, अध्ययन सामग्री और स्कूल पाठ्यक्रम में सुधार कर भारत के बहुभाषी परिदृश्य को और अधिक प्रतिबिंबित किया जाए।

इस मुद्दे पर अभिभावकों और छात्रों की प्रतिक्रियाएं भी मिली-जुली हैं। कुछ समर्थन करते हैं कि संस्कृत पढ़ाई जानी चाहिए क्योंकि यह भारतीय परंपरा और प्राचीन ज्ञान का स्रोत है। वहीं, अन्य यह मानते हैं कि आधुनिक समय में संपर्क भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं की सीख अधिक प्रासंगिक एवं व्यावहारिक होगी।

आगे चलकर तीन-भाषा सूत्र की मजबूती और सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भाषा शिक्षा को एक सशक्त, समावेशी और सभी के लिए लाभकारी बनाने के लिए नीतिगत स्तर पर सही निर्णय लिए जाएं। तभी यह सूत्र भारत के विविध भाषाई परिदृश्य में एक संतुलन स्थापित कर सकेगा और छात्रों को ज्यादा व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण प्रदान करेगा।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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