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शराब माफिया, सिस्टम और पत्रकार…!

पत्रकारों पर हमले और हत्याएं: लोकतंत्र की हत्या, सिस्टम खामोश

डेस्क…विनय मिश्रा की कलम से…

भारत में पत्रकारिता का पेशा कभी भी आसान नहीं रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारों के खिलाफ हमले, उत्पीड़न और हत्या की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है। ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि जब पत्रकार सच को उजागर करने के लिए खड़े होते हैं, तो उन्हें सत्ता और ताकतवर समूहों से चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या इन हमलों के बाद प्रशासन, कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी सिर्फ जांच तक सीमित रहती है, या सच्चाई की रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम भी उठाए जाते हैं?

23 अप्रैल को राकेश रॉय पर हुए हमले के बाद यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है। राकेश रॉय को सिर्फ एक घटना की रिपोर्टिंग करने की सजा दी गई, जबकि उन्हें अपने ही देश में अपनी जान की सलामती के लिए संघर्ष करना पड़ा। लेकिन क्या यह घटना अकेली थी? क्या ऐसी घटनाएं पहले नहीं हुईं?

राकेश रॉय ने जब छतरपुर जिले के पीपट गांव में शराब की बोतलें अधिक दामों पर बिकने की खबर का कवरेज शुरू किया, तो वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय गुंडों ने न केवल उनका फोन छीन लिया, बल्कि उनका जिस तरह से बेरहमी से पीट-पीट कर मारा, वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला करने जैसा है। और हद तो यह कि जब राकेश ने बचाव करने की कोशिश की, तो उन पर ही मामला दर्ज कर दिया गया। क्या यही है प्रशासन की न्याय की परिभाषा? क्या पत्रकारों के लिए यही है सुरक्षा का मतलब?

इसके बाद का दृश्य हैरान करने वाला था जहाँ पूरे जिले के पत्रकार एसपी, कलेक्टर और कानून व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल दिए और सड़क पर नारेबाजी की।

 

पत्रकारों पर हमलों का आंकड़ा

2025 में पत्रकारों पर हुए हमलों की संख्या में वृद्धि देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पिछले साल लगभग 50 से अधिक पत्रकारों पर हमले हुए, जिसमें कुछ की हत्या भी हुई। यह आंकड़ा और भी डरावना हो जाता है जब हम इस पर विचार करते हैं कि इनमें से अधिकतर हमले सत्ता के नजदीकी लोग, माफिया, या ऐसे समूहों द्वारा किए गए हैं जो सत्ता के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। और इन हमलों के बाद, न्याय की प्रक्रिया की धीमी गति ने प्रशासन की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं।

कुछ प्रमुख हमले और हत्याएं

दिनेश यादव (2023): उत्तर प्रदेश के पत्रकार दिनेश यादव को उनके लेखों के कारण गोली मार दी गई। उनका अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने स्थानीय नेताओं और प्रशासन के खिलाफ अवैध खनन और भूमि कब्ज़े के मामले उजागर किए थे।
सिद्धार्थ वरदराजन (2022): यह मामला असम में हुआ था जब सिद्धार्थ वरदराजन, एक प्रमुख पत्रकार, को उनके रिपोर्टिंग के कारण स्थानीय राजनेताओं और उनके समर्थकों द्वारा धमकियां दी गईं। बाद में उनका एक्सीडेंट हुआ, जिसे संदिग्ध माना गया।
गोविंद यादव (2021): बिहार के गोविंद यादव, जो एक प्रमुख न्यूज रिपोर्टर थे, उन्हें एक माफिया गिरोह ने तब मौत के घाट उतार दिया जब उन्होंने एक प्रमुख भ्रष्टाचार के मामले की रिपोर्टिंग की थी। उनकी हत्या का मामला आज तक ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।
विरेंद्र कुमार (2020): राजस्थान में एक अन्य पत्रकार, विरेंद्र कुमार, की हत्या हुई। उन्होंने प्रशासन और स्थानीय नेताओं के भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर रिपोर्टिंग की थी, जिसके कारण उन्हें अपने प्रोडक्शन के बाद ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

पत्रकारों के खिलाफ अपराध और प्रशासन का मौन

यह आंकड़ा उन घटनाओं का मात्र छोटा सा हिस्सा है, जो पत्रकारों के साथ होती हैं। हर साल हजारों पत्रकार, जो केवल सत्य की तलाश में हैं, उन्हें धमकियां मिलती हैं, उनकी जान पर संकट आता है, या फिर उनकी हत्या कर दी जाती है। ये हमले सिर्फ पत्रकारों के खिलाफ नहीं होते, बल्कि वे लोकतंत्र के मूल्यों पर हमला करते हैं। जब सत्ता या माफिया समूह अपने अनकहे अपराधों को छुपाने के लिए पत्रकारों की आवाज़ को दबाने के लिए उन्हें मार डालते हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन होता है।
आखिरकार, प्रशासन इन मामलों में क्या कर रहा है? अधिकांश मामलों में जांच पूरी नहीं होती, और अपराधी आसानी से बच जाते हैं। न्याय प्रणाली की यह चुप्पी उन लोगों के लिए प्रेरणा बन जाती है जो लोकतंत्र को दबाने की कोशिश करते हैं।

क्या है जिम्मेदारी?

पत्रकारिता का काम केवल सच को उजागर करना नहीं है, बल्कि यह जनता को उन मुद्दों से अवगत कराना भी है, जिन्हें सत्ता और प्रभावशाली लोग दबाना चाहते हैं। जब पत्रकारों को अपनी जिम्मेदारी निभाने की कीमत अपनी जान से चुकानी पड़े, तो यह सिस्टम के लिए एक गंभीर चेतावनी है। क्या भारत के लोकतंत्र को चलाने वाले लोग यह चाहेंगे कि पत्रकारों को अपने जीवन की सुरक्षा के लिए अपने ही देश में संघर्ष करना पड़े?
प्रशासन को चाहिए कि वह पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई करें और इन हमलों के खिलाफ सख्त कानून बनाए। इसके अलावा, पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए उचित उपायों को लागू किया जाना चाहिए, ताकि वे बिना डर के अपने कर्तव्यों को निभा सकें और सत्य को उजागर कर सकें।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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