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निर्माण उद्योग की बढ़ोतरी से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत सहित कई अर्थव्यवस्थाएं अग्रणी

India among economies driving carbon surge from construction boom

विश्व में वर्तमान समय में भवन निर्माण और इसका उभरता क्षेत्र पर्यावरणीय संकट का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। हाल ही की रिपोर्टों के अनुसार, निर्माण और भवन उद्योग अब वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का लगभग 37% हिस्सा बन गया है, जो उद्योग के लिए एक चिंताजनक आंकड़ा है। साथ ही, यह क्षेत्र विश्व के कुल सामग्री निष्कर्षण का लगभग 50% हिस्सा लेता है, जो इसे सबसे बड़ा संसाधन उपयोगकर्ता बनाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भवन निर्माण उद्योग का यह तेजी से बढ़ता प्रभाव न केवल ऊर्जा खपत को बढ़ाता है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव भी डालता है। इस क्षेत्र में वैश्विक ऊर्जा की खपत करीब 28% है, जो पर्यावरण की स्थिरता में बाधाएं उत्पन्न करता है।

भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस निर्माण बूम के मुख्य प्रेरक के रूप में सामने आ रही हैं, जहां आबादी में वृद्धि और शहरीकरण ने इमारतों की मांग को बढ़ा दिया है। यह मांग कच्चे माल की भारी खपत और ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा देती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में इजाफा होता है।

पर्यावरणविदों और नीति निर्धारकों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में सतत विकास की रणनीतियाँ अपनाई जाएं और ऊर्जा कुशल तकनीकों का प्रयोग बढ़ाया जाए तो इस संकट को कम किया जा सकता है। निर्माण उद्योग में पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए “ग्रीन बिल्डिंग” की अवधारणा को बढ़ावा देना आवश्यक है, जिससे न केवल ऊर्जा की बचत हो बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी नियंत्रण में रहे।

सरकारें और उद्योग जगत दोनों ही इस दिशा में कदम उठा रहे हैं, लेकिन वैश्विक मानकों के अनुरूप तेजी से बदलाव की आवश्यकता है ताकि भविष्य की पीढ़ियां एक स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण में जीवन यापन कर सकें। इसलिए, भवन निर्माण उद्योग में बेहतर नियोजन, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और नवप्रवर्तन को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

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Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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