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2% से कम कॉलेजों में ही कार्य-सम्बंधित डिग्रियां उपलब्ध: टीमलीज सर्वे

Less than 2% colleges offer work-linked degrees: TeamLease Survey

नई दिल्ली। टीमलीज सर्वे के नवीनतम निष्कर्ष दर्शाते हैं कि देश में केवल दो प्रतिशत से भी कम कॉलेज ही कार्य-सम्बंधित डिग्रियां प्रदान करते हैं। यह तथ्य शिक्षा क्षेत्र में व्यावसायिक और औद्योगिक मांगों के बीच गहरे फासले को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए नीतिगत बदलाव और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में व्यावहारिक अनुभव को बढ़ावा देना आवश्यक है।

टीमलीज सर्वे, जो भारतीय शिक्षा संस्थानों की कार्य-क्षमता और पाठ्यक्रमों की व्यावसायिक प्रासंगिकता का आकलन करता है, ने हाल ही में देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उपलब्ध डिग्री कार्यक्रमों का विश्लेषण किया। सर्वे में सामने आया है कि केवल 1.8 प्रतिशत संस्थान ऐसे कार्य-सम्बंधित कोर्सेस ऑफर करते हैं, जो सीधे उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करते हों।

विश्लेषकों के अनुसार, कार्य-सम्बंधित डिग्रियां छात्रों को व्यवसाय जगत की चुनौतियों के लिए तैयार करती हैं, जिससे वे नौकरी बाजार में बेहतर प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं। इसके विपरीत, अधिकांश शैक्षणिक संस्थान पारंपरिक और सैद्धांतिक शिक्षा पर केन्द्रित हैं, जो नियोक्ताओं की जरूरतों को पूरी तरह से संबोधित नहीं कर पाती।

शिक्षा नीति विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह आंकड़ा चिंताजनक है और इसे सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जाए ताकि पाठ्यक्रमों को व्यावहारिक और रोजगार के अनुकूल बनाया जा सके।

इसके अलावा, कई निजी शिक्षा प्रदाता सफलतापूर्वक कार्य-सम्बंधित प्रशिक्षण और डिग्री प्रदान कर रहे हैं, जिनका पाठ्यक्रम उद्योग की मांगों के अनुसार तैयार किया गया है। ये मॉडल अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

शिक्षाविदों का कहना है कि भविष्य में भारत की आर्थिक वृद्धि और युवाओं के रोजगार के अवसरों के लिए ऐसे कार्य-सम्बंधित कार्यक्रमों का विस्तार महत्वपूर्ण होगा। यह न केवल छात्रों की दक्षता बढ़ाएगा, बल्कि देश की समग्र मानव संसाधन गुणवत्ता को भी उन्नत करेगा।

इस सर्वे से शिक्षा क्षेत्र में पुनर्निर्धारण की आवश्यकता स्पष्ट होती है ताकि भारतीय युवाओं को बेहतर अवसर और रोजगार मिल सके। इसके लिए सरकारी नीतियों में बदलाव, निजी संस्थानों के साथ सहयोग और पाठ्यक्रमों में नवाचार की जरूरत है।

इस दिशा में उठाए गए कदम ही भारत को एक कौशलप्रधान और रोजगार सृजक राष्ट्र बना सकते हैं, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी हो सके।

Source

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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