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राज्यपाल: द साइलेंट सेवर मूवी रिव्यू: मनोज bajpayee की संघर्षपूर्ण भूमिका

‘Governor: The Silent Saviour’ movie review: Manoj Bajpayee struggles in a narrative vacuum

राज्यपाल: एक ऐतिहासिक पुनर्लेखन या पौराणिक कथा?

मुंबई। चिन्मय मंडलेकर के निर्देशन में बनी फिल्म “राज्यपाल: द साइलेंट सेवर” रिलीज हो चुकी है, जो अपनी कथानक संरचना और प्रस्तुति के कारण दर्शकों व समीक्षकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। इस फिल्म को कथित तौर पर एक पुनर्निर्मित इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन वास्तविकता में यह एक व्यक्ति के सेनानी के मिथक पर ज्यादा केंद्रित नजर आती है।

फिल्म की कहानी भारत के एक संवैधानिक पदाधिकारी के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो विभिन्न संस्थागत संकटों के दौरान चुनौतियों का सामना करता है। हालांकि, निर्देशक मंडलेकर ने इस बहुस्तरीय ऐतिहासिक घटना को केवल एक “वन-मैन आर्मी” होने के नाते दिखाने की कोशिश की है, जिससे वास्तविक संस्थागत प्रयास और सामूहिक संघर्ष की छवि धूमिल हो जाती है।

मनोज बाजपेयी द्वारा निभाए गए मुख्य भूमिका में संघर्ष स्पष्ट दिखता है। वे एक राष्ट्रीय राजनेता के जटिल व्यक्तित्व को पर्दे पर उतारने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और संवाद के कारण पूरी कहानी जीवंत नहीं बन पाती। पटकथा में कई जगह संवाद और घटनाएं अप्राकृतिक लगती हैं। इसके चलते दर्शक भावनात्मक तौर पर पूरी तरह जुड़ नहीं पाते।

फिल्म में जहां एक ओर स्थिर और गंभीर विषय को लेकर गंभीर अंदाज अपनाने की कोशिश की गई है, वहीं दूसरी ओर पटकथा और निर्देशन में कमजोरियां इसे औसत बना देती हैं। यह फिल्म दर्शकों को न केवल तथ्यों का सही प्रतिबिंब देने में असफल लगती है, बल्कि इससे एक पक्षीय दृष्टिकोण भी उभरकर सामने आता है।

निष्पक्षता और निष्पादन की कमी के बावजूद, “राज्यपाल” में कुछ दृश्य और कलाकारी आकर्षित करती है। सेट डिजाइन और सिनेमैटोग्राफी माध्यम के अनुरूप बनाए गए हैं, जिससे फिल्म को देखने में तकनीकी तौर पर शिकायत नहीं की जा सकती। परन्तु, कहानी की मजबूती और प्रामाणिकता के अभाव में फिल्म की प्रभावशीलता कम हो जाती है।

मीडिया समीक्षकों ने भी इस फिल्म को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। कई ने इसे एक क्लिष्ट और सीमित दृष्टिकोण में फ़ंस गई फिल्म कहा है, जबकि कुछ ने मनोज बाजपेयी के अभिनय की प्रशंसा की है।

अंत में, “राज्यपाल: द साइलेंट सेवर” ऐसी फिल्म है जो दर्शकों को राजनीतिक तथा संस्थागत इतिहास की जटिलता से अवगत कराने की बजाय केवल एक नायक की कथा प्रस्तुत करती है। यह फिल्म इतिहास के पुनर्लेखन की बजाए एक पौराणिक नायक की कहानी ज्यादा प्रतीत होती है।

समीक्षक और दर्शक इसका मूल्यांकन अपने-अपने दृष्टिकोण से करेंगे, पर यह तय है कि फिल्म चीन्मय मंडलेकर द्वारा बताई गई कथानक के दायरे में कैद रह जाती है और इतिहास के बहुआयामी स्वरूप को पूरी तरह उजागर नहीं कर पाती।

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Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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