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कुछ तो शर्म करो बुढ़ार तहसील…!

तहसील की जमीन भी “बेबस”निकली,
राजस्व विभाग की नाक के नीचे तहसील की भूमि असुरक्षित

बुढ़ार में भूमाफिया सक्रिय,राजस्व महकमा गहरी नींद में

कलेक्टर ने जिस अतिक्रमण को तोड़ा,वहां फिर अतिक्रमण

शहडोल।


जिस राजस्व विभाग की जिम्मेदारी सरकारी जमीनों की सुरक्षा और अतिक्रमण रोकने की होती है, उसी विभाग की नाक के नीचे बड़ा अतिक्रमण हो रहा है और कई मकान,संस्थान ने अपना कब्जा जमा लिया है और तहसील की बेबसी देखिए कि ये पूरा अतिक्रमण अपने आंखों के सामने होते देखता रहा ।
ऐसे में प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला तहसील बुढ़ार परिसर उससे लगे व उसके पीछे स्थित लगभग राजस्व भूमि का है, जहां कथित रूप से भू-माफिया और कुछ व्यवसायिक तत्वों द्वारा मकान और व्यावसायिक संस्थान खड़े कर लिए गए हैं और कुछ पर अतिक्रमण जारी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अतिक्रमण किसी दूर-दराज इलाके में नहीं, बल्कि सीधे तहसील परिसर से सटी हुई भूमि पर हुआ है। यानी जिस जगह से सरकारी निगरानी और नियंत्रण की शुरुआत मानी जाती है, वहीं जमीन पर कब्जे का यह खेल चलता रहा।

कलेक्टर ने तोड़ा था अतिक्रमण फिर सक्रिय हुए माफिया

पिछले कुछ वर्षों का रिकार्ड खंगाला जाए तो बुढ़ार तहसील में ऐसे 16 अतिक्रमण कारी थे जिनको नोटिस तलब कर उनके अतिक्रमण पर कार्यवाही करनी थी किंतु अपने ही सरकार का हवाला देकर रसूखदारों ने वह जारी सूची को किसी डस्टबिन में डलवा दिया किंतु भूमि का विवादों से नाता नही टूटा और आज भी वहां माफिया सक्रिय हैं जनाकरी के अनुसार माफियाओ की नेटवर्किंग इस कदर है कि शनिवार और इतवार का आड़ देखकर उसमे दीवाल,कंक्रीट किया जा रहा है। जिस भूमि पर अभी कार्य चल रहा है उसे तत्कालिक कलेक्टर द्वारा पूर्व में अतिक्रमण युक्त बताकर अतिक्रमण हटवाया गया था और कार्रवाई की गई थी, लेकिन समय के साथ स्थिति फिर से पहले जैसी हो गई। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या कार्रवाई सिर्फ अस्थायी साबित हो रही है और अतिक्रमण हटाने के बाद निगरानी व्यवस्था पूरी तरह ढीली पड़ जाती है।
अपनी ही भूमि को बचाने में नाकाम राजस्व महकमा

बुढ़ार में सरकारी जमीन और उनसे हेरफेर का रिकॉर्ड खंगाला जाए तो एक आध हिस्सा भी सरकारी भूमि तहसील के पास न बचा होगा किंतु जब तहसील अपनी ही भूमि को सुरक्षित रखने में सक्षम नहीं है, तो दूरस्थ सरकारी भूमियों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। लोगों का कहना है कि यह पूरा मामला राजस्व तंत्र की कार्यशैली, नियमित निरीक्षण और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है।
चर्चा यह भी है कि अतिक्रमण धीरे-धीरे हुआ और समय रहते रोकथाम नहीं की गई, जिससे निर्माण कार्य पक्का होता चला गया। अब स्थिति यह है कि भूमि पर पक्के निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियाँ दिखाई देने लगी हैं, जिससे भविष्य में कार्रवाई और भी जटिल हो सकती है।
लोगों ने व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि शायद अब सरकारी रिकॉर्ड में ही जमीन सुरक्षित रह गई है, जबकि जमीन पर उसका स्वरूप बदल चुका है। वहीं कुछ लोग इसे “प्रशासनिक सुस्ती” और “नियमित निगरानी की कमी” का परिणाम बता रहे हैं।
राजस्व विभाग कटघरे में..

इस पूरे मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों की मांग है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।
बुढ़ार क्षेत्र में यह मामला अब केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रतीक बन गया है जहां सवाल यह है कि अगर तहसील की जमीन ही सुरक्षित नहीं, तो बाकी व्यवस्था कितनी सुरक्षित है?

इनका कहना है..

(मैं दिखवाता हूँ शायद उस भूमि की पहले नपाई हुई है अगर कलेक्टर ने तुड़वाया था तो निश्चित ही उसमे कोई खामियां रही होंगी,मनोज सिंह तहसीलदार बुढ़ार)
शासन अपनी ही ज़मीन नहीं बचा पा रहा है, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद कैसे करे l राजस्व में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है, और भू माफिया इसी का लाभ उठा कर बड़ी सफ़ाई से शासकीय जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं l
बुढ़ार तहसील इसका जीता जागता उदाहरण है l तत्कालीन कलेक्टर श्री सतेन्द्र सिंह ने अपने कार्यकाल में बड़े पैमाने पर बुढ़ार तहसील की शासकीय जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराया था l अब उनके जाने के बाद वही जमीनें फिर से निजी कैसे को गई, ये तो तहसीलदार महोदय बुढ़ार ही बेहतर बता सकेंगे l

एडवोकेट शैलेन्द्र श्रीवास्तव
समाजसेवी

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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