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सफ़र कर रहा है (ग़ज़ल) — सुल्तान ए. गहलोत

सफ़र कर रहा है (ग़ज़ल) — सुल्तान ए. गहलोत

हवा में नफ़रतों का ज़हर असर कर रहा है
कोई मोहब्बत से फिर भी बसर कर रहा है

उसे यक़ीं है कि इक दिन ये रात ढलनी है
हर बार बस यही सोचकर सबर कर रहा है

हवा का रुख़ बदलने की ज़िद में इक पंछी
थके हुए परों से भी सफ़र कर रहा है

वो अपने सच की हिफाज़त में उम्र भर
हर एक झूठ को बेअसर कर रहा है

मेरी निगाह में बस वही आदमी बड़ा निकला
जो टूटकर भी मुसलसल सफ़र कर रहा है

सुल्तान ए. गहलोत
कवि एवं अध्यापक
पूर्व छात्र, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ (उ. प्र.)

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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