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सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर केंद्र ने झारखंड के DGP की नियुक्ति रद्द करने की मांग की

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर केंद्र ने झारखंड के DGP की नियुक्ति रद्द करने की मांग की

नयी दिल्ली: झारखंड की पुलिस सेवा में एक महत्वपूर्ण विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने राज्य की डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को रद्द करने की याचिका दाखिल की है। केंद्र का आरोप है कि उनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करते हुए की गई है, जिसमें डीजीपी की नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यकाल को लेकर स्पष्ट निर्देश हैं।

मामला तब और गंभीर हो गया जब यह पता चला कि तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को डीजीपी बनाया गया था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि मात्र अगले दिन 31 दिसंबर थी। केंद्र का मानना है कि राज्य सरकार ने अपनी नियुक्ति नियमों में बदलाव कर इस निर्णय को लिया, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश क्या कहते हैं?

2006 के प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि किसी राज्य के डीजीपी का चयन संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा प्रस्तुत पैनल से किया जाना चाहिए। इसमें वरिष्ठता, अच्छे सेवा रिकॉर्ड और अनुभव को महत्व दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, नियुक्त डीजीपी को आम तौर पर कम से कम दो साल का कार्यकाल मिलना चाहिए।

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने उन प्रथाओं की आलोचना की जिनमें अधिकारी को रिटायरमेंट से ठीक पहले डीजीपी नियुक्त किया जाता था और फिर उसे लंबा कार्यकाल दिया जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने निर्देशों के उल्लंघन के रूप में माना।

केंद्र का झारखंड के नियमों पर सवाल

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि UPSC के पैनल में शामिल अधिकारी के पास कम से कम छह महीने की सेवा बची होनी चाहिए। हालांकि दो साल के न्यूनतम कार्यकाल का प्रावधान बरकरार है। इसके विपरीत झारखंड ने 29 दिसंबर 2025 को अपनी नियमावली में बदलाव किया, जिसमें छह महीने की शेष सेवा की शर्त हटा दी गई। यही बदलाव तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का आधार बना, जिसे केंद्र ने गलत ठहराया है।

केंद्र सरकार पहले भी झारखंड राज्य को पत्र लिखकर इस नियुक्ति को रद्द करने और नए डीजीपी चयन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कह चुकी है।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अर्जी पर 13 अप्रैल को सुनवाई तय कर ली है।

केंद्र का तर्क है कि झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करके नियमों में बदलाव किया और एक दिन बची सेवा वाले अधिकारी को डीजीपी नियुक्त किया। इससे पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता और प्रशासन की पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं।

झारखंड सरकार की ओर से अभी इस मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है। राज्य की पुलिस व्यवस्था और कानून अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर ये मामले अब उच्च न्यायालय की निगाहों में हैं।

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