दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

कैसे कॉर्पोरेट मॉडल उच्च शिक्षा को बदल रहा है

कैसे कॉर्पोरेट मॉडल उच्च शिक्षा को बदल रहा है

क्या एक कॉर्पोरेशन की तर्कशक्ति को उस संस्था के मॉडल के रूप में अपनाना उचित होगा, जिसका उद्देश्य ज्ञान का सृजन और उसे चुनौती देना है? यह सवाल आज शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण बहस का विषय बन चुका है। कॉर्पोरेट मॉडल, जो मुख्यतः लाभकारी सिद्धांतों और प्रबंधन की दक्षता पर आधारित है, उसे उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है।

शिक्षा संस्थान पारंपरिक रूप से स्वतंत्र ज्ञान की खोज और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए होते हैं। लेकिन जब इन्हें कॉर्पोरेट ढाँचे में ढालने की कोशिश होती है, तो इस प्रक्रिया में धन की प्राथमिकता और बाज़ार की मांगें प्रमुख भूमिका निभाने लगती हैं। इससे शिक्षा का स्वरूप केवल व्यावसायिक और रोजगारोन्मुखी बन कर रह जाता है।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से अकादमिक स्वतन्त्रता और नवाचार को खतरा हो सकता है। जब शिक्षा संस्थान लाभ और दक्षता के आधार पर काम करने लगते हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। शोध कार्यों का चुनाव भी आर्थिक लाभ के आधार पर होने लगता है, जिससे मूलभूत और स्वतंत्र शोधों को नुकसान पहुँचता है।

दूसरी ओर, कुछ लोगों का तर्क है कि कॉर्पोरेट मॉडल से शिक्षा संस्थान अधिक संगठित और प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है और शिक्षा की गुणवत्ता में वृद्धि हो सकती है। लेकिन यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि क्या ऐसे मॉडल ज्ञान के मौलिक उद्देश्य के साथ मेल खाते हैं या नहीं।

इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षा नीतिकारों, शिक्षाविदों और समाज के बीच समुचित संवाद और समझ आवश्यक है ताकि उच्च शिक्षा का स्वरूप समकालीन जरूरतों के साथ संतुलित रूप में स्थापित किया जा सके। केवल कॉर्पोरेट सिद्धांतों का अनुसरण कर देना ज्ञान के सृजन और उसकी आलोचना के उस उद्देश्य को कमजोर कर सकता है, जिस पर शिक्षा का निर्माण हुआ है।

Source

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!