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भूमि की कमी ने कृषि मंत्रालय के मौसम नेटवर्क विस्तार को किया प्रभावित

भूमि की कमी ने कृषि मंत्रालय के मौसम नेटवर्क विस्तार को किया प्रभावित

नई दिल्ली। कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित मौसम नेटवर्क परियोजना अपनी तय समय सीमा से एक साल पीछे चल रही है। इस परियोजना का उद्देश्य देश भर में बारिश नापने वाले सेंसर और मौसम स्टेशनों की स्थापना करके कृषि से जुड़े मетеोरोलॉजिकल डेटा की सटीकता और पहुंच को बढ़ाना था। लेकिन अब तक योजना के 96 प्रतिशत से अधिक बारिश और मौसम मापक उपकरण स्थापित नहीं हो पाए हैं, जिससे परियोजना की सफलता पर सवाल उठ रहे हैं।

पता चला है कि निजी साझेदारों ने बताया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण में बदलाव के कारण भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अचानक यह निर्देश जारी किया है कि सेंसर छतों पर नहीं बल्कि सीधे जमीन पर स्थापित किए जाएं। इस निर्णय से जहां उपकरण लगाने की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो गई है, वहीं इससे संबंधित आधारभूत संरचनाओं की भी नई मांगें उत्पन्न हुई हैं।

इस बदलाव का असर पूरे नेटवर्क के विस्तार पर पड़ा है, क्योंकि पहले से डिजाइन और योजना के अनुसार कई जगहों पर उपकरण छतों पर लगाने थे। जमीन पर उपकरण लगाने हेतु उपयुक्त भूमि, सुरक्षा और जमीन से जुड़ी अन्य तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करना अब बड़ा चुनौती भी बन गया है।

मौसम विभाग के अधिकारियों और निजी साझेदारों के बीच संवाद के अभाव के कारण भी समस्या बढ़ी है। निजी साझेदारों का कहना है कि बिना पर्याप्त समन्वय के लगाए गए ऐसे फैसले परियोजना की समय सीमा और बजट को प्रभावित कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि देश के कृषकों के लिए इस प्रणाली का विकसित होना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह बारिश और मौसम से संबंधित सूचनाएं कृषि योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए सरकार और मौसम विभाग को मिलकर समय रहते जमीन की समस्या का समाधान निकालना होगा ताकि यह परियोजना सफल हो सके।

वर्तमान स्थिति में परियोजना के धीमे चले जाने से किसानों को उम्मीद के मुताबिक लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो देश की कृषि वृद्धि पर लंबी अवधि में प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में समय पर कदम उठाना आवश्यक है ताकि मौसम नेटवर्क को तेजी से स्थापित किया जा सके और खरीफ तथा रबी सीजन में सटीक मौसम की जानकारी किसान तक पहुंचाई जा सके।

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