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Kullu Dussehra 2026: न रामलीला, न रावण दहन, जानिए क्यों खास है कुल्लू का सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव

कुल्लू, हिमाचल प्रदेश। भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा पर्व विभिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है। ज्यादातर स्थानों पर विजयदशमी के दिन रामलीला के मंचन के बाद रावण का पुतला जलाया जाता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में ऐसा नहीं होता। यहां न रामलीला आयोजित की जाती है और न ही रावण दहन की परंपरा है। कुल्लू में विजयदशमी के एक दिन बाद सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव शुरू होता है, जिसकी पहचान सदियों पुरानी देव मिलन परंपरा है।

300 से अधिक देवी-देवता पहुंचते हैं भगवान रघुनाथ जी के दरबार में

कुल्लू दशहरे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा देव समागम है। इस दौरान 300 से अधिक देवी-देवता अपने-अपने क्षेत्रों से पहुंचकर भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरते हैं। इस परंपरा के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की धार्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक विरासत एक साझा मंच पर दिखाई देती हैं। यही वजह है कि कुल्लू दशहरे का स्वरूप देश के अन्य दशहरा आयोजनों से काफी अलग है।

विजयदशमी के अगले दिन शुरू होता है उत्सव

जहां देश के कई हिस्सों में दशहरा पर्व विजयदशमी के दिन ही प्रमुख आयोजन के साथ संपन्न हो जाता है, वहीं कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव अगले दिन शुरू होता है। सात दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में भगवान रघुनाथ जी की आराधना और देवी-देवताओं का समागम प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यह आयोजन कुल्लू की धार्मिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।

अंतिम दिन लंका बेकर में निभाई जाती हैं धार्मिक परंपराएं

उत्सव के सातवें दिन ब्यास नदी के किनारे लंका बेकर में विशेष धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। यहां अष्टांग बलि की औपचारिकता के बाद घास-फूस और झाड़ियों के तीन अलाव जलाए जाते हैं। यह आयोजन सामान्य दशहरा उत्सवों में होने वाले रावण दहन से अलग है।

इन परंपराओं के बाद भगवान रघुनाथ जी रथ पर सवार होकर मंदिर लौटते हैं। देव समागम में शामिल देवी-देवता भी अपने-अपने देवालयों की ओर प्रस्थान करते हैं। इसके साथ ही सात दिवसीय उत्सव का समापन होता है।

1649 से जुड़ी है भगवान रघुनाथ जी की परंपरा

कुल्लू दशहरे का ऐतिहासिक महत्व भगवान रघुनाथ जी की आराधना से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1649 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। इसके बाद यह परंपरा क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बनी।

कुल्लू दशहरा इस बात का उदाहरण है कि भारत में एक ही पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में विशिष्ट परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहां रावण दहन के बजाय देव मिलन और भगवान रघुनाथ जी की आराधना उत्सव का मुख्य आकर्षण हैं।

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