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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल: सभी हाई कोर्ट में मुकदमों के नामकरण और पंजीकरण प्रक्रिया में एकरूपता की मांग

नई दिल्ली, दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रियाओं में एकरूपता लाने से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को अपनी मांगों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी को विस्तृत ज्ञापन सौंपने की अनुमति दी है। इस ज्ञापन में देश के सभी उच्च न्यायालयों में मुकदमों के नामकरण, पंजीकरण प्रक्रिया और न्यायिक शब्दावली को एक समान करने का प्रस्ताव रखा जाएगा।

मंगलवार को इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। इस पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान पीठ ने जनहित याचिका को न्यायिक पक्ष पर सुनने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की ओर से उठाया गया मुद्दा प्रासंगिक है और न्यायिक व्यवस्था के व्यापक हित से जुड़ा हुआ है।

याचिका में मुख्य रूप से देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में मुकदमों के नामकरण और पंजीकरण की प्रक्रिया में मौजूद अंतर को दूर करने की मांग की गई है। इसके साथ ही न्यायालयों में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली को भी मानकीकृत करने का सुझाव दिया गया है।

दरअसल, अलग-अलग उच्च न्यायालयों में न्यायिक प्रक्रियाओं और मुकदमों के वर्गीकरण के लिए अलग-अलग नाम और शब्द इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इससे न्यायिक व्यवस्था में समानता और प्रक्रियाओं को समझने के स्तर पर अंतर पैदा होता है। ऐसे में एक समान व्यवस्था विकसित करने से न्यायिक कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

मुकदमों के नामकरण और पंजीकरण प्रक्रिया में एकरूपता होने से वकीलों, याचिकाकर्ताओं और आम नागरिकों को न्यायिक प्रक्रियाओं को समझने में आसानी हो सकती है। साथ ही न्यायालयों के बीच प्रशासनिक समन्वय बेहतर बनाने की दिशा में भी यह उपयोगी कदम साबित हो सकता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट फीस का मुद्दा भी सामने आया। इस संबंध में पीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट फीस निर्धारित करना राज्यों के विधायी अधिकारों के अंतर्गत आता है। इसलिए इस विषय पर राज्यों के अधिकारों का सम्मान किया जाना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से ज्ञापन सौंपने की अनुमति मिलने के बाद अब इस मुद्दे को ई-कमेटी के समक्ष रखा जा सकेगा। हालांकि, न्यायिक प्रक्रियाओं में एकरूपता लागू करने को लेकर फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

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