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हँसते-हँसते पी गया जो जहर का प्याला,मौत को लगाया गले,एथेंस की गलियों में घूमने वाला, कौन है यह शख्स…???

 

 

डेस्क…दुनिया

आज से तकरीबन 2000 वर्ष पूर्व यूनान एथेंस की गलियों में एक ऐसे शख्स ने जन्म लिया जो दुनिया मे अपनी मौत के बाद भी अपनी छाप छोंड़ गया।खुद से सवाल करना और सवालों से ही सवाल का हल निकाल देना सुकरात की खूबी थी।सुकरात के पिता मूर्तिकार थे घरेलू स्थिति इतनी अच्छी तो नही थी पर खराब भी नही थी।पागलों और घुमक्कडों की तरह दिन भर एथेंस की गलियों मे घूमने वाला यह व्यक्ति एक दिन लोगो के लिए मसीहा हो जाएगा यह किसी ने न सोंचा था।
सुकरात का जन्म 469 ईसा पूर्व में एथेंस हुआ था। उसके पिता एक संगतराश थे और उसकी माता दाई का काम करती थीं। प्रारभ में तो सुकरात ने अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाया और उनकी सहायता की। बाद में वह सेना की नौकरी में चला गया। वह पैटीडिया के युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ा था। अपनी वार्ताओं के कारण ही सुकरात अपने समय का सबसे अधिक ज्ञानवान व्यक्ति समझे जाते थे कुछ समय तक सुकरात एथेंस की काउंसिल का सदस्य भी रहा रहे। वहां उसने पूरी इमानदारी और सच्चाई के साथ काम किया, उसने कभी भी गलत का साथ नहीं दिया। चाहे अपराधी हो या निर्दोष, उसने किसी भी व्यक्ति के साथ गलत नहीं होने दिया।
सुकरात ने दो विवाह किया था । उसकी पहली पत्नी का नाम ‘मायरटन’ था। उससे सुकरात को दो पुत्र प्राप्त हुए थे। जबकि दूसरी पत्नी का नाम था ‘जैन्थआइप’। इसने एक पुत्र को जन्म दिया था।

क्यों सुनाई गई मौत की सजा…

एथेंस में सुकरात से बहुत नफरत की जाती थी, क्योंकि वह लोगों को अज्ञानी और मूर्ख बनाकर उन्हें अक्सर शर्मिंदा करता था। वह लोकतंत्र का मुखर आलोचक भी था , जिसे एथेंस के लोग बहुत महत्व देते थे, और वह तीस तानाशाहों के कुछ सदस्यों से जुड़ा था , जिन्होंने 404-403 ईसा पूर्व में एथेंस की लोकतांत्रिक सरकार को कुछ समय के लिए उखाड़ फेंका था। वह यकीनन उन अपराधों का दोषी था, जिनका आरोप उस पर लगाया गया था, अधर्म और युवाओं को भ्रष्ट करना, क्योंकि उसने शहर के देवताओं को अस्वीकार किया था और उसने अपने युवा अनुयायियों के बीच सत्ता के प्रति अनादर को प्रेरित किया था हालाँकि उसका यह इरादा नहीं था। तदनुसार उसे दोषी ठहराया गया और जहर देकर मौत की सजा सुनाई गई।
माना जाता है महान दार्शनिक सुकरात देवताओं पर विश्वास नहीं करने, युवाओं को भड़काने जैसे आरोपों में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी।
सुकरात खुद को बचा सकते थे। उन्होंने स्वैच्छिक निर्वासन में जाने के बजाय मुकदमे में जाना चुना। अपने बचाव भाषण में, उन्होंने आरोपों के कुछ लेकिन सभी तत्वों का खंडन किया और प्रसिद्ध रूप से घोषणा की कि “बिना जांचे-परखे जीवन जीने लायक नहीं है।” दोषी ठहराए जाने के बाद, वह मृत्यु से कम एक उचित दंड का प्रस्ताव कर सकते थे, लेकिन शुरू में उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने अंततः भागने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह उनकी प्रतिबद्धता के साथ असंगत था कि वे कभी गलत काम नहीं करेंगे (भागने से कानूनों के प्रति अनादर दिखाया जाएगा और उनके परिवार और दोस्तों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचेगा।
उनके लिए जहर तैयार किया जा रहा था। सूर्यास्त से पहले जहर देने का आदेश था। दोपहर ढल चुकी थी और शाम होने को थी। जो सैनिक उनके लिए जहर तैयार कर रहा था, उसके पास जाकर सुकरात ने कहा, ‘विलंब क्यों कर रहे हो, जरा जल्दी करो।’ सैनिक चकित होकर बोला, ‘आप क्या कह रहें हैं! मैं तो जान-बूझकर धीरे-धीरे कर रहा हूं।’ सुकरात ने कहा, ‘अपने कर्तव्य का पालन करने में ढिलाई नहीं बरतनी,
सुकरात के खास शिष्य प्लेटो उन्हें जेल से भगाने के लिए पूरा जतन कर रहे थे किंतु सुकरात को यह मंजूर नही था, जेल में रहने वाले कुछ शिष्यों ने उनसे कहा जेल के सारे सिपाही हमारे साथ हैं। हम सब आपको यहां से लेकर सुरक्षित जगह चले चलते हैं।’ सुकरात ने पहले रोते हुए शिष्यों को झिड़का, फिर अन्य शिष्यों से बोले ‘ तुम लोग इस मिट्टी की देह के लिए क्यों इतने परेशान हो? मेरे विचार तो हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे। इस देह के लिए मैं चोरों की तरह भाग जाऊं और छिपकर रहूं? मेरा देह मरेगा पर विचार और आत्मा सदैव जीवित रहेगी। मैंने इस जीवन का बहुत आनंद लिया, अब मैं मृत्यु का आनंद लेना चाहता हूं।’
इतने में सैनिक ने सुकरात को जहर देने के बाद रोने लगा,सुकरात जहर को सिप सिप कर पीने लगे थोड़ी देर बाद वह अपने शरीर को चादर से ढंक लिए और कुछ देर बाद एक अंतिम साँस के बाद उनकी मृत्यु हो गई।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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