दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,
Search
Close this search box.

शिक्षा के विरोध में पत्थर व गोबर फेंकते थे लोग…कौन थी यह देश की पहली महिला शिक्षिका

डेस्क…देश-दुनिया

 

जब कभी भी भारत मे समानता के अधिकार की बात की जाती है हमे बाबा साहेब द्वारा लिखित संविधान में निहित अधिकारों
और उसमें प्रदत्त मौलिक अधिकारों का स्मरण जरूर हो जाता है। जहाँ बाबा साहेब ने मौलिक अधिकारों में शिक्षा जैसे अनिवार्य तत्वों को सम्मलित कर आम आदमी के लिए इसे मील का पत्थर साबित कर दिया।आधुनिक पुनर्जागरण में स्त्रियों के लिए अनिवार्य शिक्षा, विवाह,विधवा पुनर्विवाह जैसे कुरूतियों को दूर करने के लिए कई अग्रदूत जन्म लिए किन्तु स्त्रियों को अनिवार्य रूप से उनकी आजादी समेत शिक्षा दिलाने में सावित्री बाई फुले का योगदान इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा।
18वीं शताब्दी में शिक्षा के पैमाने स्त्री पुरुष के लिए तय किए गए थे, खासतौर पर लड़कियों को शिक्षा पाने के लिए अपनों का ही विरोध झेलना पड़ता था. सावित्री बाई फुले के बिना देश में महिला शिक्षा और समाजिक उत्थान की बात अधूरी है.

जन्म व शिक्षा-दीक्षा…

3 जनवरी को, भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा में हुआ. सावित्रीबाई ने महिलाओं और बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया। उन्होंने विधवाओं के उत्थान के लिए भी अथक प्रयास किए। आज भी, सावित्रीबाई फुले को एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई।
एक जमाने में जब महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रखा जाता था, सावित्रीबाई फुले ने समाज के रूढ़िवादी मान्यताओं को चुनौती देते हुए नारी सशक्तिकरण का बिगुल बजाया। महज नौ वर्ष की उम्र में विवाह बंधन में बंधी सावित्रीबाई ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर समाज सुधार के लिए कई बड़े काम किए।
सावित्रीबाई ने औरतों के हक के लिए बहुत लड़ाई लड़ी। उन्होंने सिर्फ औरतों के लिए ही नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी आवाज उठाई जिन्हें समाज में कमतर समझा जाता था। उन्होंने जाति-पाति, छुआछूत और विधवाओं के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ खड़े होकर बात की। सावित्रीबाई ने गरीबों और औरतों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोले। उन्होंने लोगों को यह समझाना चाहा कि सब बराबर हैं और किसी को कम नहीं समझना चाहिए। सावित्रीबाई सिर्फ समाज सेवा करने वाली महिला ही नहीं थीं, बल्कि वे बहुत अच्छी कवि भी थीं। अपनी कविताओं के जरिए उन्होंने लोगों को समाज की बुराइयों के बारे में बताया।

शिक्षा का विरोध,गोबर फेंकते थे लोग…

बताया जाता है कि सावित्रीबाई फुले जब लड़कियों को पढ़ाने स्कूल जाती थी तो पुणे में स्त्री शिक्षा के विरोधी उन पर गोबर फेंक देते थे, पत्थर मारते थे. वे हर दिन बैग में एक्स्ट्रा साड़ी लेकर जाती थी और स्कूल पहुंचकर अपनी साड़ी बदल लेती थीं. सावित्रीबाई ने उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोला जब बालिकाओं को पढ़ाना-लिखाना सही नहीं माना जाता था. सावित्रीबाई फुले एक कवियत्री भी थीं. उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था.
पहले तो फुले इस क्रांतिकारी पहल में अकेले ही चली थी पर आगे बढ़ती गई और कारवाँ बनता गया, फुले दंपति के इस क्रांतिकारी कार्य में फातिमा शेख ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वह ज्योतिबा फुले के मित्र उस्मान शेख की बहन थीं, जिन्होंने उन्हें अपने घर में आश्रय दिया था। फातिमा शेख ने फुले दंपति द्वारा स्थापित स्कूलों में पढ़ाई की और बाद में वहीं पढ़ाने लगीं.

मरीजों के देखभाल के दौरान हुई मौत…

सावित्रीबाई फुले के पति ज्‍योतिराव फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई थी, तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कामों को पूरा करने के लिए संकल्प लिया था. उसके बाद सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च, 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई. उनका पूरा जीवन समाज के वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने- लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मणवादी ग्रंथों को फेंकने की बात करती थीं.
आज भी जब कभी दलित-शोषित महिलाओं के शिक्षा और उत्थान की बात होती है, सावित्री बाई फुले का योगदान हर किसी के दिमाग मे घर कर जाता है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!