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क्या अबकी बार जिला ब्यौहारी…???

…या फिर होती रहेगी यूँ ही दुश्वारी

शहडोल… विनय मिश्रा की कलम से

विंध्य की धरा से लगा ब्यौहारी क्षेत्र समय-समय पर ऐसे सूरमाओं को दिया है जो न सिर्फ विंध्य की धरा बल्कि प्रदेश मुख्यालय में अपना अमिट छाप बनाए ये विडम्बना है कि ब्यौहारी वासी अपने वजूद को स्थापित न कर सके समय-समय पर विंध्य प्रदेश की माँग जरूर उठती रही पर इसे उस मुकाम तक नही पहुंचाया जा सका।पिछले कई दशकों से ब्यौहारी की जनता ब्यौहारी जिले की रट लगा रही है पर आज तक इस आवाज को प्रदेश मुख्यालय तक मुखर नही किया गया।बीते कुछ वर्ष पहले जब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ब्यौहारी आए थे तब भी शहर के होर्डिंग और बैनरों में ब्यौहारी जिला बनाने की माँग उठी थी इस विषय पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मंशा भी प्रकट की थी किंतु अच्छी राजनैतिक पकड़ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं से भरे इस क्षेत्र को जिला नही बनाया जा सका। वैसे ब्यौहारी वासियों का यह माँग जायज भी है चूंकि जनसंख्या घनत्व,क्षेत्रफल भौगोलिक कारकों आवगमनो जैसी बुनियादी सुविधाओं को देखते हुए भी किसी स्थान को जिले का दर्जा दिया जाता है हलाकि इसका दायित्व राज्य सरकार के पास होता है या फिर विधानसभा में इसे कानून पारित करके भी बनाया जा सकता है ।आंकड़ो की माना जाए तो वर्तमान के ब्यौहारी क्षेत्र में 60 फीसदी वोट सत्तापक्ष के हैं जिसका उदाहरण दशकों से बन रहे भाजपा- विधायक सांसद हैं किंतु ब्यौहारी को जिला बनाना आज भी विधायक-सांसद के “माथे की लकीर ही रह गई”और हाँथ आया तो सिर्फ झुनझुना। दूरी और सीमा क्षेत्रों के हिसाब से एक जिले का दूसरे जिले से दूरी लगभग 50 किमी की होनी चाहिए इस हिसाब से ब्यौहारी जिला बनना लाजिमी है।

आइए इसकी भौगोलिक स्थिति को समझते हैं..

ब्यौहारी से शहडोल जिले की दूरी लगभग 100किमी,ब्यौहारी से सीधी जिले की दूरी लगभग 70किमी ब्यौहारी से उमरिया की दूरी लगभग 100किमी वहीं ब्यौहारी से रीवा की दूरी 100किमी के आसपास है तो बाणसागर के कुछ ही दूर पर सतना जिले की सीमा लग जाती है जिसकी दूरी भी 100 के आसपास है । ब्लाक क्षेत्रों की मानें तो ब्यौहारी में तीन चार ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें ब्लाक का दर्जा दिया जा सकता है…पपौन्ध,बुढ़वा,बाणसागर देवलोंद
सम्पूर्ण ढांचों के बाद भी ब्यौहारी का जिला न बनना कहीं न कहीं राजनीतिक शून्यता के अलावा कुछ नही कहा जा सकता । कोल जनजाति सम्मेलन में भगवान बिरसा मुंडा की पुण्य तिथि में इस बार प्रदेश के नए मुखिया ब्यौहारी आ रहे हैं शायद भगवान उनकी मति फेर दें और ब्यौहारी वासियों की किस्मत में जिला ब्यौहारी बनना लिख जाए ।

एक जिले का गुणा-भाग..

जब भी किसी नए जिले को बनाने की घोषणा की जाती है तो वहां इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का बड़ा कार्य होता है। इनमें प्रशासनिक भवन जैसे- जिला मुख्यालय, जिला न्यायालय, कृषि, शिक्षा, जिला परिषद, स्वास्थ्य विभाग आदि के संचालन के लिए भवन। इन जिलों के पास बड़ी बैठकें करने के लिए हॉल और भवन। यहां कार्य करने के लिए स्टाफ व प्रशानिक अधिकारियों की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा मुख्यालय के विकास के लिए सड़क निर्माण से लेकर अन्य सुविधाएं मुहैया कराना व जिला मुख्यालय से तहसीलों को सड़क मार्ग से जोड़ने व पानी की समुचित व्यवस्था करने, सफाई आदि का खाका खींचने जैसी आवश्यकता होती है
समय-समय पर राज्य जरूरत के हिसाब से नए जिले बनाते रहे हैं। जिलों के गठन से केंद्र का कोई लेना-देना नहीं होता। राज्य खुद ही इसका फैसला करता है। इसमें जिलों को बढ़ाना, उन्हें बदलना, किसी का दर्जा खत्म करना आदि शामिल है। इसके लिए राज्य के राजस्व विभाग की ओर से एक समिति बनाई जाती है, जो सिफारिशें करती है और उसके बाद सरकार उस पर अपनी मंजूरी देती है। जिला बनाने का मुख्य मापदंड जनसंख्या और उसके क्षेत्रफल पर निर्भर करता है। आम तौर पर एक जिले की जनसंख्या 10 लाख के आसपास होती है। इसके अलावा मौजूदा जिला मुख्यालय से इसकी दूरी कम से कम 50 किलोमीटर होनी चाहिए और जिले में कम से कम तीन से चार तहसील और उपखंड मुख्यालय होने चाहिए।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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