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मणिपुर हिंसा और न्याय की निगरानी: जस्टिस गीता मित्तल समिति का कार्यकाल क्यों बढ़ाया गया

मणिपुर में हिंसा का लंबा साया

मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा ने राज्य को गहरे सामाजिक और मानवीय संकट में धकेल दिया। हिंसा के चलते सैकड़ों लोगों की जान गई, हजारों घर छोड़ने को मजबूर हुए और बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे व बुजुर्ग राहत शिविरों में जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे हालात में पीड़ितों के पुनर्वास, सुरक्षा और न्याय को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सीधी दखल

राज्य में हालात सामान्य न होने और राहत कार्यों की धीमी प्रगति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में अहम कदम उठाया। शीर्ष अदालत ने पीड़ितों की राहत, पुनर्वास और मुआवजा प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक विशेष समिति गठित की। इस समिति की अध्यक्षता जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गीता मित्तल को सौंपी गई।

समिति का उद्देश्य और जिम्मेदारी

समिति को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह राहत शिविरों की स्थिति, विस्थापितों की जरूरतों, मुआवजा वितरण और पुनर्वास योजनाओं की प्रगति पर नजर रखे। साथ ही, पीड़ितों से जुड़े मामलों में सामने आ रही कमियों को उजागर कर सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट दे।

कार्यकाल बढ़ाने का कारण

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति का कार्यकाल 31 जुलाई तक बढ़ा दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ को बताया गया कि समिति का कार्यकाल पिछले वर्ष जुलाई में समाप्त हो चुका था। हालांकि, जमीनी स्तर पर काम अधूरा होने और हालात की गंभीरता को देखते हुए कार्यकाल बढ़ाना जरूरी समझा गया।

42 रिपोर्टें और उनका महत्व

पीठ को यह भी अवगत कराया गया कि समिति अब तक मणिपुर हिंसा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट को 42 रिपोर्टें सौंप चुकी है। ये रिपोर्टें केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें राहत शिविरों की वास्तविक स्थिति, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पुनर्वास की चुनौतियों का विस्तृत उल्लेख है।

समिति की संरचना

जस्टिस गीता मित्तल के साथ इस समिति में बॉम्बे हाईकोर्ट की सेवानिवृत्त जज शालिनी पी. जोशी और दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज आशा मेनन शामिल हैं। तीनों न्यायाधीशों का अनुभव समिति को संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

आपराधिक मामलों की अलग निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि हिंसा से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच निष्पक्ष रहे। इसके लिए महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक दत्तात्रेय पद्सलगीकर को जांच की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, जो सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करते हैं।

निष्कर्ष

जस्टिस गीता मित्तल समिति का कार्यकाल बढ़ाया जाना यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट मणिपुर हिंसा को केवल बीता हुआ मामला नहीं मानता। जब तक पीड़ितों को पूर्ण न्याय और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिल जाता, तब तक न्यायिक निगरानी जारी रखने का यह एक मजबूत संकेत है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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