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वाह!कलेक्टर फैक्ट चेक अच्छा है..

वाह!कलेक्टर फैक्ट चेक अच्छा है..

सत्ता का अहंकार चरम पर!

सीएम विरोध पर नाबालिग छात्र को जेल में ठूंसा, बोर्ड परीक्षा कुचली
शहडोल।

आज डिजिटल जमाने मे सरकार और उसके नौकरशाहों को पत्रकारों द्वारा खोजी खबर का खंडन करने का नायाब तरीका मिल गया है जिसे आप फैक्ट चेक के नाम से जानते हैं अगर आप “फैक्ट चेक” का मतलब नही जानते और आपकी इंग्लिश कमजोर है तो तो आप इसे हिंदी में अनुवाद कर लीजिए फैक्ट मतलब तथ्य और चेक मतलब जाँचना यानी तथ्यों को जाँचना या परखना चलिए मुख्यमंत्री कार्यक्रम का फैक्ट चेक करते हैं हलाकि कलेक्टर साहब धनपुरी नगरपालिका के पूर्व घोटालों और निर्माण कार्यो की जाँच करकर भी नगरपालिका का फैक्ट चेक कर सकते थे वाटरपार्क के आसपास के अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर अभी अधूरे हैं और इन्हें भी फैक्ट चेक के दायरे में रख लेना चाहिए की ठेकेदार कौन है, निविदा कब निकला,किस फर्म के बिल लगे और कितना आय-व्यय किसकी निगरानी में हो रहा है इससे बड़ा फैक्ट चेक शायद नही हो सकता।
अब असली फैक्ट चेक की बात करते हैं जिसकी वजह से कई फैक्ट तैयार हुए और बनाए गए।मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में विरोध की आवाज उठाने पर प्रशासन ने ऐसी दमनकारी कार्रवाई की कि एक नाबालिग छात्र को जेल भेज दिया गया और उसकी बोर्ड परीक्षा छूट गई। यह घटना प्रदेश में तानाशाही मानसिकता और सत्ता के दुरुपयोग का जीता-जागता उदाहरण बन गई है।
8 फरवरी को धनपुरी में काँग्रेस का यूथ विंग मुख्यमंत्री के काफिले के खिलाफ काला झंडा दिखाकर विरोध दर्ज कराया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कलेक्टर ने बिना चेतावनी युवाओं पर धावा बोला, और उनके विरोध में खुद विरोधी बनकर युवाओं को डंडा चला पड़े और उन्हें हिरासत में ले लिया। इन्हीं में 12वीं कक्षा का छात्र सत्यम भी था, जिसकी बोर्ड परीक्षा अगले ही दिन थी।

किशोर न्याय कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि नाबालिग को सामान्य जेल नहीं भेजा जा सकता। लेकिन यहां प्रशासन ने कानून की किताब को रद्दी में फेंक दिया और छात्र को वयस्क अपराधियों की तरह जेल भेज दिया सवाल है कि क्या सत्ता के सामने कानून भी के कद छोटे हो गए ?
बोर्ड परीक्षा छात्र के जीवन का सबसे अहम पड़ाव होती है, लेकिन सत्ता के अहंकार और प्रशासनिक क्रूरता ने एक छात्र का साल बर्बाद कर दिया। परिवार और अन्य स्रोतों का आरोप है कि छात्र मानसिक रूप से टूट गया था और प्रशासन ने कोई मानवीय संवेदनशीलता नहीं दिखाई।
प्रशासन अब फैक्ट चेक के माध्यम से सफाई दे रहा है कि छात्र को समय पर छोड़ दिया गया था। लेकिन आदेश रात में जारी करना और सुबह औपचारिक रिहाई देना क्या संवेदनशीलता है?
क्या पुलिस का काम केवल बस में बैठा देना था?
पुलिस ने छात्र को परीक्षा केंद्र तक सुरक्षित पहुंचाना जरूरी क्यों नही समझा।
जबकि इस पूरे फिल्म की स्क्रिप्ट तहसीलदार से लेकर जिला कलेक्टर तक रची गई है जिन दस्तावेजो का अभाव बताया गया उसे तहसीलदार बुढ़ार जाँचने में लेटलतीफी करते रहे और लालफीताशाही को अंजाम देकर अंततः युवक को जेल भेज दिया सुबह की दरमियानी पुलिस द्वारा उसे छोड़ा जाता है उसमें भी किराया सहित।
क्या किराया और 2 घण्टे से पूर्व छात्र को छोड़ना उसके मानसिक तनाव को कम कर सकता था क्या हाथ मे लगे हथकड़ी और उसे बिना किसी जघन्य अपराध के सलाखों में डालना उसके बालपन की भरपाई कर सकता है।

क्या ये बाल न्यायालय, मानव अधिकारों और उसके मौलिक अधिकार का हनन नही है, क्या उसकी परीक्षा की तिथि पुनः निर्धारित की जाएगी,क्या उसका 12 वीं बोर्ड इंग्लिश पेपर के शिक्षक इस परीक्षा में अनुपस्थित होने की इस कहानी को जान पाएंगे क्या वो उसे उत्तीर्ण कर देंगे।
सवाल बहुत हैं और अंतिम सवाल यह है कि यह कोई साधारण घटना नही बल्कि “सरकारी दमन” है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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