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आत्मरक्षा स्वभाव से निपटने के प्रभावी तरीके

How to deal with defensiveness

समाज में परस्पर संबंधों को बेहतर बनाने के लिए व्यक्ति के अपने भावनात्मक नियंत्रण का महत्व दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। जब हम दूसरों की भावनाओं को बदल नहीं सकते, तो सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखें। इस संदेश को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि आत्मरक्षा स्वभाव से निपटना और अपनी भावनाओं को शांत रखना किसी भी सामाजिक स्थिति में बेहतर संवाद के लिए आवश्यक है।

विशेषज्ञों ने बताया है कि अक्सर लोग अपनी रक्षा में आ जाते हैं क्योंकि वे खुद को असहज या खतरे में महसूस करते हैं। इस स्थिति में यह समझना जरूरी है कि दूसरों की भावनाओं को बदलना संभव नहीं है, लेकिन हम अपने तरीकों और प्रतिक्रियाओं में सुधार कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले अपने गुस्से, डर और निराशा जैसे भावों को समझना और नियंत्रित करना आवश्यक है।

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. रीमा वर्मा के अनुसार, ‘जब हम अपने आप को नियंत्रित करना सीख जाते हैं, तो हम बेहतर तरीके से संवाद कर पाते हैं और सामने वाले की प्रतिरक्षा भावना को कम कर सकते हैं। शांत दिमाग से हम स्थिति को बेहतर समझ पाते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं।’

वहीं, व्यवहार विज्ञानी अनिल कुमार कहते हैं कि आत्म-नियंत्रण के लिए ध्यान, योग और गहरी साँस लेने की तकनीकें उपयोगी साबित हो रही हैं। ये तरीके मन को स्थिर रखते हैं और आवेग नियंत्रण में मदद करते हैं। इससे बातचीत के दौरान किसी भी प्रकार की अनावश्यक प्रतिक्रिया कम हो जाती है और समस्याओं को सुलझाने में आसानी होती है।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि हम दूसरों की भावनाओं को बदलने की कोशिश छोड़ दें और अपनी भावनाओं पर काम करें, तो पारस्परिक संबंधों में सुधार संभव है। सामाजिक और पारिवारिक जीवन में यह बहुत जरूरी होता है कि हम वातावरण को सकारात्मक बनाए रखें न कि विवादास्पद।

अंत में कहा जा सकता है कि प्रतिरक्षा या रक्षात्मक व्यवहार को समझना और अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना आधुनिक समाज में सफल संवाद और संबंधों की कुंजी है। जब हम अपने मन की शांति बनाए रखते हैं तो हम न केवल खुद बेहतर बनते हैं बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी वातावरण को सुखद बनाते हैं।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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