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शमशाद बेगम की 107वीं जयंती: भारत की पहली प्लेबैक सिंगर, जिन्हें आशा-लता ने माना अपना आदर्श और किशोर कुमार करते थे आदरपूर्वक कुर्सी उठाना

शमशाद बेगम की 107वीं बर्थ एनिवर्सरी:भारत की पहली प्लेबैक सिंगर, आशा-लता से कहा जाता था- इनकी तरह गाओ, किशोर कुमार उठाते थे कुर्सी

1931 की बात है जब भारत-पाकिस्तान एक था और सीमाएं नहीं थीं। लाहौर, बॉम्बे और कोलकाता के स्टूडियो में फिल्में बनने लगी थीं, रेडियो का दौर शुरू हुआ और कुछ कंपनियां गाने रिकॉर्ड करती थीं। इसी दौर में, लाहौर की जेनोफोन म्यूजिक कंपनी के एक स्टूडियो में एक 12 साल की लड़की, शमशाद बेगम, संगीत की दुनिया में कदम रखने आईं। वे अपने गरीब परिवार से आती थीं और ऑडिशन में उनका चयन लीजेंडरी म्यूजिक कंपोजर गुलाम हैदर ने तुरंत कर लिया।

गुलाम हैदर ने शमशाद के 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट तुरंत मंजूर कर लिया, साथ ही उन्हें सभी सुविधाएं दीं जो टॉप सिंगर्स को मिलती थीं। शमशाद बेगम ने अपने करियर में लगभग 6000 गीत गाने का कीर्तिमान स्थापित किया। उनके गाने आज भी सुनाई देते हैं और रीमिक्स किए जाते हैं। उनकी आवाज़ की गूंज ने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश भारत के लाहौर में हुआ। बचपन से ही उनका संगीत में गहरा लगाव था। उन्होंने स्कूल के प्रोग्राम्स और शादी समारोहों में गाना शुरू किया, जहां उनकी आवाज़ की खासियत जल्द ही सामने आई। उनके पिता, जो रूढ़िवादी थे, शुरुआत में उनके गाने को नकारते थे और गाने को घर में हराम मानते थे। लेकिन उनकी प्रतिभा को देखकर परिवार ने हाँ कर दी, बशर्ते वे पूरी जिंदगी बुर्का पहनें और उनकी तस्वीरें न छपें।

1932 में उन्होंने गणपत लाल बट्टो से शादी की, जो हिंदू समुदाय से थे, जबकि शमशाद मुस्लिम परिवार से थीं। इस शादी ने सामाजिक बंधनों को तोड़ा और शमशाद ने अपनी आवाज़ से संगीत जगत में एक नई मिसाल कायम की। शमशाद बेगम की आवाज़ ने वह मुकाम हासिल किया कि किशोर कुमार जैसे लीजेंडरी सिंगर भी उनकी सेवा में कुर्सियां उठाकर चलते थे। आशा भोसले और लता मंगेशकर सहित कई प्रसिद्ध गायिकाओं ने उनकी आवाज़ की नकल की और उनसे प्रेरणा ली।

उनका फिल्मी सफर काफी सफल रहा। महबूब खान ने उन्हें मुंबई बुलाया और कई मशहूर फिल्मों में उन्होंने अपना जलवा दिखाया। उन्होंने ‘सैंया दिल में आना रे’, ‘कजरा मोहब्बत वाला’, और ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमां कर हम भी देखेंगे’ जैसे सुपरहिट गीत गाए। हालांकि उन्होंने कैमरे के सामने कभी प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन उनकी आवाज ने पर्दे पर हीरो-हीरोइन की भूमिका निभाई।

1955 में पति के निधन के बाद वे गायिकी से कुछ समय के लिए दूर हो गईं, लेकिन महबूब खान के आग्रह पर 1957 में फिल्म ‘मदर इंडिया’ के लिए लौट आईं। उनका गाया हुआ गाना ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली’ आज भी किसी परिचय का मोहताज नहीं। शमशाद ने 1965 में पूरी तरह इंडस्ट्री से संन्यास ले लिया।

उनकी बेटी ऊषा भी संगीत जगत में आईं, लेकिन शमशाद ने उन्हें फिल्मी दुनिया में आने की अनुमति नहीं दी। 23 अप्रैल 2012 को 94 वर्ष की उम्र में शमशाद बेगम का निधन हुआ, पर उनकी आवाज़ और संगीत हमेशा याद रखे जाएंगे। उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा के अनुसार हिंदू रीति-रिवाजों से अंत्येष्टि कराई गई।

शमशाद बेगम ने न केवल अपने सामाजिक बंधनों को तोड़ा बल्कि संगीत की दुनिया में एक नई इबारत लिखी। उनकी कहानी न केवल संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा है, बल्कि उन सभी के लिए मिसाल है जो सामाजिक बंदिशों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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