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CM हेल्पलाइन का “खास” अनुभव – शिकायतें, समाधान और एक लम्बे इंतजार की कहानी

CM हेल्पलाइन का “खास” अनुभव – शिकायतें, समाधान और एक लम्बी इंतजार
डेस्क…

विनय मिश्रा की कलम से

अगर आप सोंच रहे हैं कि आपने CM हेल्पलाइन में हेल्प लेकर कोई तीर मार लिया है तो आप गलत सोच रहे हैं बल्कि आपने सम्बंधित विभाग के कर्मचारी, अधिकारी से उड़ता तीर ले लिया है जहाँ शिकायतों के बाद एक लंबी पेसेंसी के रूप में लेवल के इर्दगिर्द शिकायतें घूमती है और अंततः थक हारकर फरियादी भी परिणाम या जाँच की आस छोड़ देता है।
विभाग में हुई शिकायतों की जाँच, कार्यवाई करने की बाजय अधिकारी इस कदर शिकायतों पर झूठ बोलते हैं जितनी सफाई से CM हेल्पलाइन पर शिकायत लिखी जाती है।
बीते कुछ माह पहले मुख्यमंत्री के इस हेल्पलाइन को सख्त बनाने के लिए और अधिक पारदर्शिता लाने के लिए झूठी शिकायत और जाँच पर FIR तक के निर्देश दिए गए किन्तु यह निर्देश भी सरकारी दफ्तरो के चक्कर लगाते-लगाते CM हेल्पलाइन के डायल 181 तक पहुच गया।बेहतर है इस शिकायत की आसरा छोड़ फरियादी कोर्ट की शरण ले ले कम से कम जब भी परिणाम आएगा सार्थक ही आएगा यहाँ तो परिणाम आने की बजाय अधिकारियों के झूठ के आसरे निपटारा कर दिया जाता है।
एक दौर था जब हेल्पलाइन 181 जनता की समस्याओं के समाधान का “सुपरहीरो” माना जाता था, किंतु अब सिर्फ एक ‘सपने’ जैसा प्रतीत होता है। क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी शिकायत को हल करने के लिए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर कॉल करने के बाद जो होता है, वह क्या किसी फिल्मी सीरीज़ से कम है? नहीं? तो आज हम आपको दिखाते हैं इस जादुई नंबर का असली चेहरा।

शहडोल में अधिकांश फरियादी की कहानी कुछ ऐसी है

आप अपनी शिकायत दर्ज कराते हैं, फिर आपको उम्मीद होती है कि कोई जल्द ही फोन उठाएगा और कहेगा, “आपकी समस्या का समाधान हो गया लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। शिकायत दर्ज होते ही उसे एक जादुई प्रक्रिया से गुजरने के लिए छोड़ दिया जाता है जिसे “अस्थायी निस्तारण” कहते हैं!
यदि आपने शिकायत की, तो आप जानेंगे कि आपकी शिकायत एक पंक्ति में दर्ज होकर अदृश्य हो जाती है। पूरी हेल्पलाइन व्यवस्था ऐसा काम करती है जैसे शिकायतों के समाधान के लिए उन्हें एक बहुत बड़े दस्तावेज़ के बीच कहीं छुपा दिया जाता है। क्या अधिकारियों को पता नहीं चलता कि आपकी शिकायत कितनी गंभीर है? क्या यह सिर्फ एक ‘नकली’ सिस्टम बन गया है ताकि अधिकारी अपनी शाही कुर्सी पर आराम से बैठ सकें, बिना किसी वास्तविक परिणाम के?

पेंडेंसी के नाम से फोरक्लोज का सफर

सबसे बड़ा मज़ा तब आता है, जब आपको आपकी शिकायत का “हल” सिर्फ एक चीज़ में मिलता है – “पेंडिंग”। जी हां, आपकी शिकायत हफ्तों तक, महीनों तक “पेंडिंग” रहती है। कभी कभार अधिकारी इसकी स्थिति को ठीक से अपडेट भी करते हैं। लेकिन ये अपडेट सिर्फ यही होते हैं: “अभी हल नहीं हुआ है, कृपया इंतजार करें”। अब सोचिए, क्या यही जवाब है जिसे आप मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से उम्मीद करते हैं?
पेंडेंसी के इस खेल में ऐसा खेला होता है कि लेवल-1 से लेकर लेवल 2,3,4 न जाने ऐसे कितने लेवल होते है जिनसे फरियादी की शिकायत होकर गुजरती तो है पर निराकारण प्रतिशत मात्र का।
आज भी कई शिकायतों की फाइलें उठा ली जाए तो सम्बन्धित विभाग का झूठ और फरियादी के बिना मर्जी फोरक्लोज के बीच का दायरा समझ आ जाएगा।

आम जनता की राहत व सुविधा के लिए बना था हेल्पलाइन

आम जनता की परेशानियों के लिए हेल्पलाइन शुरू की गई थी, लेकिन अब यह सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है। सरकार को शायद यकीन है कि हेल्पलाइन की संख्या को बढ़ा दिया जाए तो समस्या का हल अपने आप आ जाएगा। मगर, सवाल यह है कि कितने लोग उस हल के बारे में जान पाते हैं? क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन इस पूरे मुद्दे की गंभीरता को समझ पा रही है या फिर यह सिर्फ एक फैशनेबल “हैशटैग” बनकर रह गई है?
आखिरकार, क्यों 100 में से 10 शिकायतें ही जाँच व कार्यवाही से गुज़रती है और बाकी फोरक्लोज से।
क्या वजह है कि जब हर नागरिक अपनी शिकायत को सही तरीके से दर्ज कराता है, तो उसे हल करने में महीनों लग जाते हैं? क्या इस सिस्टम इतना अपडेट नहीं है कि तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके? क्या हमारे नेताओं और अधिकारियों को “शिकायतों” की स्थिति पर जल्दी से जल्दी नजर डालने का कोई समय नहीं मिलता?

कहाँ खो जाते हैं समाधान?

शिकायतों का समाधान तब तक नहीं मिलता, जब तक कोई उच्च अधिकारी व्यक्तिगत तौर पर उस पर ध्यान न दे! आम आदमी तो बस इंतजार करते रहते हैं, मगर समाधान की रौशनी कहीं दूर तक नहीं दिखाई देती।
हमारे आसपास कई ऐसे फरियादी हैं जो इस हेल्पलाइन का मज़ाक उड़ा रहे हैं और कहते हैं कि यह हेल्पलाइन उनकी समस्याओं का नहीं, बल्कि अधिकारियों की भ्रष्टाचार का एक सिस्टम है।
समाधान की बजाय, “कुछ नहीं” पर ध्यान!
तो सवाल ये है कि क्या हमारे प्रशासन को आम जनता की शिकायतों पर समय से काम करने की आदत कभी पड़ेगी? जब आप मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से समाधान की उम्मीद करते हैं, तो वह उम्मीद अक्सर एक चुटकुला बन जाती है। कभी “पेंडिंग”, कभी “अभी काम चल रहा है”, और कभी “दूसरे विभाग से संपर्क करें” जैसी बातें सुनकर आम नागरिक घेरने वाली परेशानी का ही शिकार हो जाते हैं।
तो इस पूरे सिस्टम को एक तरफ रखकर यह सोचिए कि आखिरकार, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन किसके लिए है? क्या यह आम नागरिकों के लिए है, या सिर्फ एक शो है, जिसे हमें यकीन दिलाने के लिए दर्शाया जाता है कि “देखो, सरकार काम कर रही है!”

हकीकत तो यह है की CM हेल्पलाइन की शिकायतें भी ठीक कोर्ट और वकील के बीच उस कड़ी की तरह हो गई है जहाँ तारीख और फैसलों के समय बदलते हैं पर परिणाम या न्याय नही मिलता।
अगर आप CM हेल्पलाइन पर अपनी शिकायत दर्ज करने जा रहे हैं, तो अपना दिल थामकर रखिए। क्योंकि समाधान का इंतजार तो लंबा ही होगा जब तक कोई “जादुई पल” नहीं आ जाता।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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