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बंगाल में राजनीतिक हिंसा का नया अध्याय: शुवेन्दु अधिकारी के PA की हत्या:राजनीतिक हिंसा पर तमाचा…

बंगाल में राजनीतिक हिंसा का नया अध्याय: शुवेन्दु अधिकारी के PA की हत्या:राजनीतिक हिंसा पर तमाचा…

कोलकाता।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा अब सिर्फ खबरों में नहीं, बल्कि वास्तविकता में आम हो चुकी है। भाजपा नेता शुवेन्दुअधिकारी के निजी सहायक (PA) की शनिवार रात हत्या इस भयावह वास्तविकता को उजागर करती है। हत्या की यह घटना न केवल कानून व्यवस्था की विफलता को दिखाती है, बल्कि राजनीतिक दलों की नैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाती है।
स्थानीय पुलिस ने जांच शुरू कर दी है, लेकिन अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। पीए की हत्या योजनाबद्ध और ठोस इरादे से की गई प्रतीत होती है। घटनास्थल और आसपास के सीसीटीवी फुटेज पुलिस हाथ में लेकर मामले की गहन छानबीन कर रही है।

टीएमसी बनाम भाजपा: राजनीति की दोहरी छाया

पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा किसी नए विषय की तरह नहीं है। टीएमसी और भाजपा दोनों ही दलों पर आरोप लगे हैं कि वे राजनीतिक लाभ के लिए हिंसा और धमकी का सहारा लेते हैं। टीएमसी का कहना है कि भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, जबकि भाजपा टीएमसी पर कट्टर हिंसा का आरोप लगाती है। लेकिन सवाल यही है कि इस खेल में सुरक्षा और इंसानियत की कीमत कौन चुका रहा है? आम जनता, नेताओं के सहयोगी, और कार्यकर्ता—सभी इस राजनीतिक टकराव की मार झेल रहे हैं।

राजनीतिक दलों की बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप अब जनता के लिए कोई राहत नहीं है। बंगाल में हिंसा और हत्या की यह श्रृंखला साफ़ संकेत देती है कि दोनों प्रमुख दल सत्ता की दौड़ में इंसानियत और कानून को पीछे छोड़ चुके हैं। नेता और उनके सहयोगी सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए असुरक्षित माहौल में जी रहे हैं, और प्रशासन अक्सर केवल नज़र बचाने का काम कर रहा है।
शुवेन्दु अधिकारी के PA की हत्या केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राजनीतिक हिंसा का प्रतीक बन चुकी है, जिसमें टीएमसी और भाजपा दोनों ही शामिल हैं। यदि राज्य प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई नहीं की, तो बंगाल में कानून और नैतिकता दोनों ही समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।
बंगाल की सड़कों पर हिंसा सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि सत्ता के खेल का हिस्सा बन चुकी है। टीएमसी और भाजपा, दोनों को अब केवल आरोप लगाने की बजाय जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिंसा रोकने का काम करना होगा। वरना यह राज्य सिर्फ राजनीतिक खेल का अखाड़ा बनकर रह जाएगा, जहां इंसानियत और जीवन की कीमत केवल राजनीति की भेंट चढ़ती रहेगी और ऐसे ही पूर्वाग्रह से ग्रसित राजनैतिक हत्यारो की बलि चढेंगे आम आदमी…
सोचिए;क्या राजनीति आम आदमी की बलि लेगी…क्या जीत का जश्न आम जनता की छाती पर लात रखकर मनाया जाएगा…
शायद नही!

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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