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चुप्पी से चीख: बूंग द्वारा पितृसत्तात्मक अन्याय का मौन सामना

Silent scream that lingers: Boong’s quiet reckoning with patriarchal injustice

मणिपुर की जटिल सामाजिक संरचना और गहरे पितृसत्तात्मक ताने-बाने पर एक नई फिल्म ने बड़ा सवाल उठाया है। इस फिल्म की कहानी एक युवक के लंबे समय से लापता पिता की तलाश के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन इसके साथ ही यह मणिपुरी समाज में विद्यमान लैंगिक असमानताओं और कठोर पितृसत्ता की जड़ें भी उद्घाटित करती है।

फिल्म दर्शकों को केवल एक पारिवारिक ड्रामा तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक गहन विमर्श को प्रोत्साहित करती है। मणिपुरी संस्कृति में पुरुषों और महिलाओं के भूमिकाओं की जो कठोर सीमाएं और अपेक्षाएँ निर्धारित की गई हैं, उन्हें फिल्म ने बड़ी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्म की कहानी में नायक के संघर्षों के माध्यम से, दर्शक उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को महसूस कर पाते हैं जो अक्सर व्यक्तिगत आकांक्षाओं और स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाती है।

विशेष रूप से इस फिल्म ने मणिपुरी समाज में सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने का साहस किया है, जिसने जहां परिवार के भीतर权 समिति और पुरुष प्रधान नियमों को उजागर किया है। यह फिल्म न केवल परिवार और पितृत्व के महत्व पर केंद्रित है, बल्कि यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे सामाजिक सामंजस्य उस समय तक स्थिर रहता है जब तक हम ऐसी संरचनाओं को अपडेट करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हो जाते।

साहित्यिक रूप से मजबूत पटकथा और जीवंत निर्देशन ने इसे एक ऐसा मंच बनाया है जहां दर्शक अपने जीवन और सत्तारूढ़ सामाजिक मूल्यों के बीच सम्बंध पर विचार कर सकते हैं। इस तरह की रचनाएं समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए आवश्यक हैं क्योंकि वे हमें दबे हुए मुद्दों को समझने और पहचानने की प्रेरणा देती हैं।

फिल्म प्रदर्शित करती है कि कैसे पारंपरिक पितृसत्तात्मक सोच लगातार समाज में नए-नए रूप धारण करती है और कैसे युवा पीढ़ी को इन प्रतीकों को तोड़ना होगा ताकि अधिक समतामूलक समाज की स्थापना हो सके। यह सामाजिक आत्मावलोकन का एक महत्वपूर्ण कदम है और दर्शकों को व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों ही स्तरों पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।

Source

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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