दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

डीजल की कतारों में खड़ा किसान कैसे लहलहाएगी फसल..!

किसान को मना, बड़े वाहनों को हां—ये कौन सा ‘ईंधन नीति न्याय’ है?”

डेस्क…विनय मिश्रा

डीजल-पेट्रोल की क्राइसेस न सिर्फ इंफ़्रा और ट्रांसपोर्टेशन के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है बल्कि इस जंग में सबसे ज्यादा यद्ध लड़ रहे हैं क्षेत्र के किसान..
भारत की 70%आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है जिस देश की 70 फीसदी आबादी और उसकी अर्थव्यवस्था किसानों और खेती पर टिकी हो उस देश का किसान पेट्रोल पम्पो पर खड़ा होकर अन्न उगाने के लिए पेट्रोल मालिकों से याचना कर रहा है। गनीमत है कि 1960 के दशक में बनी उपकार फिल्म इन दिनों के थियेटर में नही है नही तो प्राण साहब का ये गाना “मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती”भी फ्लॉप हो जाता और अब प्राण साहब ऊपर जाकर भी शर्मिंदा होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के “जय जवान जय किसान” के नारे से प्रेरित इस फिल्म में अगर आज प्रधानमंत्री शास्त्री होते तो किसानों की दुर्दशा देखकर अपने इस नारे में गौर जरूर करते।
भारत में लगभग 14–15 करोड़ कृषि पर निर्भर लोग हैं जो कृषि परिवार और श्रमिक वर्ग हैं। आकंड़ों के अनुसार भारत के कुल डीजल खपत का लगभग 13% से 40% तक कृषि क्षेत्र में खपत होता है।
खाद्यान्न व्यवस्था से लेकर अर्थव्यवस्था की नींव रखने वाले “किसान को डीजल कम, ट्रक को टंकी भर ईंधन नीति किसी विडंबना से कम नही है।
देश में ईंधन की कहानी आजकल कुछ ऐसी है कि खेत पूछ रहा है कि मैं सूखा क्यों हूँ?” और बाकी भारी वाहन और ट्रक मुस्कुरा कर जवाब दे रहा है “मेरी टंकी देखो, मैं तो पूरा भरकर चलता हूँ।”
हमारे कुछ किसान भाइयों ने बताया कि ग्रामीण इलाकों से लेकर हाईवे तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि ये “ईंधन की कमी है या वितरण के समझ की?”
किसानों का कहना है कि खेती के लिए जरूरी डीजल कई बार आसानी से उपलब्ध नहीं होता या सीमित मात्रा में दिया जाता है। वहीं दूसरी तरफ भारी वाहनों की लंबी कतारें पेट्रोल पंप पर “फुल टैंक” मोड में दिखती हैं।खेत की जुताई करते समय डीजल का पैमाना तय करना कई बार मुश्किल हो जाता है ऐसे में खत्म होने पर किसी किसान भाई का ट्रैक्टर तो नही मागा जा सकता और ट्रैक्टर दे भी दिया तो अपने लिए डीजल तो डिब्बे या बॉटल में ही लाना पड़ेगा।मजाक में सही पर पर एक किसान भाई ने कहा कि “हम ट्रैक्टर लेकर आएँ तो डीजल सोच-समझकर मिलता है, और ट्रक आए तो टंकी भर जाती है… शायद खेती अब भारी वाहन नीति के हिसाब से हो रही है।
दूसरी तरफ, कई राहगीरों से बात हुई उन्होंने भी अपना दर्द बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर गांव या किसी भी सड़क पर चलते हुए मोटर साइकिल या दो पहिया वाहन के पेट्रोल खत्म हो जाते हैं ऐसे में पेट्रोल पंपों के दूर होने में मजबूरी या जरूरी जो भी समझें गाड़ी घसीटा नही जा सकता और बॉटल डिब्बे के सहारे के बिना आगे बढ़ा नही जा सकता पेट्रोल पंप में पहुँचने पर नोजल मैन पेट्रोल नही देता कई बार बहस और विवाद इतना बढ़ जाता है कि मारपीट होने लगता है।
फिर जिम्मेदार और आरोपी हो जाता है वो राहगीर या किसान जो अपने हक और जरूरत के लिए हिंसा तक पहुँच जाता है।
खैर समस्या इस व्यवस्था की नही समस्या पूरे सिस्टम की है इस देश मे पेपरलीक की जवाबदेही सरकार नही लेती,cbsce एक्जाम लीक होने की जवाबदेही सरकार नही लेती,राम मंदिर में 200 करोड़ गबन होने की जवाबदेही नही लेती,मध्य एशिया में ईरान जैसे देशों से अच्छे सम्बंध होने के बाद तेल अमेरिका से लेने पर जवाब नही देती तो फिर अपने बनाए नीतियों पर जवाब कैसे देगी।
सवाल बड़ा टेढ़ा है- हर समस्या की भरपाई आम जनता ही क्यों करती है या आम जनता पर ही देश की समस्या क्यों थोपी जाती है

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!