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क्या होता अगर हर CBSE-OSM उत्तर पुस्तिका खोली जाती

What If every CBSE-OSM answer script had been opened?

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ओपन स्कोरिंग मॉड्यूल (OSM) प्रक्रिया के दौरान केवल कुछ उत्तर पुस्तिकाओं की स्वतंत्र जांच ही की गई, जिससे परीक्षा के डिजिटलीकरण, सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन में गहरे और बड़े स्तर के समस्याएं छिपी रह गईं। यह सवाल उठता है कि क्या व्यापक पारदर्शिता न होने के कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दे अनदेखे रह गए हैं?

पिछले वर्षों में CBSE ने अपने मूल्यांकन प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जो पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किए गए थे। मगर विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान मॉडल में केवल सीमित संख्या में उत्तर पुस्तिकाएं ही जांच में आती हैं, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

इस संदर्भ में एक प्रस्तावित “सात दिवसीय पारदर्शिता ढांचा” पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके तहत परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद छात्र और अभिभावक सात दिन की अवधि में अपनी उत्तर पुस्तिकाओं को स्वतंत्र रूप से देख सकेंगे। इससे न केवल जालसाजी और त्रुटियों को तत्काल पकड़ा जा सकेगा, बल्कि छात्र और अभिभावकों में बोर्ड के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा।

विशेषज्ञों और शिक्षा नीतिकारों का मानना है कि ओपन स्कोरिंग मॉड्यूल में व्यापक सुर्खियों के बावजूद, इसके संचालन में कई कमियां हैं। डिजिटल जांच प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम होने के कारण कई बार तकनीकी त्रुटियां और मूल्यांकन की गलतियां सामने आ सकती हैं। पुनर्मूल्यांकन की मौजूदा नीति भी पर्याप्त पारदर्शिता प्रदान नहीं करती, जिससे छात्र असंतुष्ट रहते हैं।

यह प्रस्तावित सात दिन की पारदर्शिता अवधि CBSE की विश्वसनीयता बढ़ाने तथा जांच प्रणाली को अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे न केवल छात्रों को अपनी ग्रेडिंग पर विश्वास होगा, बल्कि परीक्षाओं की निष्पक्षता व गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।

परीक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस योजना को लागू करने के लिए तकनीकी और लॉजिस्टिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन यह परिवर्तन आज के डिजिटल युग में आवश्यक है। विशेषज्ञों ने भी इस कदम का समर्थन किया है क्योंकि इससे बोर्ड और छात्रों के बीच की दूरी कम होगी और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता का स्तर बढ़ेगा।

इस पूरे विवाद के बीच, यह स्पष्ट होता है कि केवल कुछ उत्तर पुस्तिकाओं की जांच परीक्षा की जटिलताओं और तकनीकी खामियों को उजागर करने के लिए पर्याप्त नहीं है। डिजिटल और मानवीय दृष्टिकोण दोनों को शामिल करते हुए, व्यापक और दक्ष निगरानी की जरूरत है ताकि विद्याथियों को उनकी मेहनत के अनुसार न्याय मिल सके और शिक्षा प्रणाली में विश्वास कायम रखा जा सके।

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Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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