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सतलुज फिल्म समीक्षा: राज्यीय हिंसा का विश्लेषण

‘Satluj’ movie review: The anatomy of state violence

देश में सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में कई ऐसे संघर्ष हुए हैं जिन्हें समय-समय पर याद रखना जरूरी होता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है जिसमें अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने एक अकेले दीपक की तरह अपनी भूमिका निभाई है, जो सबसे अंधेरी रातों में भी अपनी आस्था को बनाये रखता है। यह फिल्म एक सामाजिक कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को समर्पित है, जिनका जीवन और संघर्ष आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शक है।

निर्देशक हनी त्रेहन ने इस फिल्म में नागरिकों के मानवीय अधिकारों के हनन और उससे जुड़ी राजनीतिक और सामाजिक वाद-विवाद की गहराई से पड़ताल की है। फिल्म की कहानी न केवल जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन के घटनाक्रमों को उजागर करती है बल्कि यह राज्य की हिंसा और उस पर चल रहे प्रोपेगैंडा को भी चुनौती देती है। दिलजीत दोसांझ ने अपने चरित्र में अत्यंत संवेदनशीलता और आत्मविश्वास का परिचय देते हुए इसे दर्शाया है कि कभी-कभी एक व्यक्ति की दृढ़ता पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन सकती है।

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे असली साहस और सच्चाई के लिए खड़ा होना, सामाजिक बदलाव के लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जसवंत सिंह खालड़ा ने अपने जीवन में जो न्याय और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष किया, वह आज भी हमारे सोचने और समझने की क्षमता को चुनौती देता है।

फिल्म ने समीक्षकों से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया हासिल की है और इसे सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली कृति माना जा रहा है। हनी त्रेहन का निर्देशन साफ़, प्रभावशाली और संवेदनशील है, जो दर्शकों को एक गहरी सोच में डाल देता है। दिलजीत दोसांझ का अभिनय पूरे फिल्म के दौरान स्थिर और बेहद प्रभावशाली है, जो कहानी की प्रामाणिकता को स्थापित करता है।

इस फिल्म को देखना प्रत्येक दर्शक के लिए महत्वपूर्ण है ताकि वे समझ सकें कि नागरिकों की मानवीय गरिमा पर हो रहे हमलों के खिलाफ आवाज उठाना ही समाज में बदलाव लाने का पहला कदम होता है। “सतलुज” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है जो हमें अंधकार में भी प्रकाश की आशा जगाने का प्रेरणास्त्रोत प्रदान करता है।

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Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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