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डिजिटल युग से पहले भारतीय पटचित्र कलाकारों ने कैसे सुनाई कहानियां

How Indian Patachitra artistes narrated stories long before the digital age

पटचित्र कलाकारों की कथा-कला: ‘पाटा देखाबो?’ प्रदर्शनी में उजागर हुई सामाजिक संदेशों की परंपरा

नई दिल्ली। भारतीय लोककला की विरासत में पटचित्र कला का विशेष स्थान रहा है, जो सदियों से समाज में घटनाओं, कहानियों और संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम रही है। इसी परंपरा को उजागर करते हुए राष्ट्रीय लोककलाविद्यालय (KNMA) में ‘‘पाटा देखाबो?’’ नामक एक प्रदर्शनी लगाई गई है। यह प्रदर्शनी पटचित्रों की कथा-कला और सामाजिक संदेशों को संवाद के माध्यम के तौर पर पेश करती है।

पटचित्र एक प्रकार का लंबा पेंटिंग वाला स्क्रॉल होता है, जिसे कलाकार पारंपरिक रूप से हाथ से बनाते हैं। इन स्क्रॉल्स में धार्मिक, सामाजिक, और राजनीतिक विषयों को खूबसूरती से चित्रित कर विभिन्न समुदायों के बीच कहानी कहने का काम किया जाता था। प्रदर्शनी में इस कला के कई नमूने रखे गए हैं, जो दर्शकों को उस समय के सामाजिक परिवेश से जोड़ते हैं।

‘‘पाटा देखाबो?’’ का उद्देश्य केवल कला की सुंदरता को प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि यह भी दिखाना है कि कैसे ये कथात्मक स्क्रॉल्स लोगों को सूचित करने और सामाजिक चेतना जगाने में मददगार रहे। प्रदर्शनी में कई ऐतिहासिक पटचित्र शामिल हैं, जिनमें विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के मुद्दे प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं।

क्यूरेटर के अनुसार, ‘‘इस प्रदर्शनी के माध्यम से हम यह दिखाना चाहते हैं कि पटचित्र में केवल कलात्मक अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि सामाजिक संदेशों का संप्रेषण भी छुपा है। पुराने जमाने में जब डिजिटल मीडिया मौजूद नहीं था, तब ये स्क्रॉल्स खबरों और कहानियों का माध्यम बनते थे।’’

परंपरागत रूप से, कलाकार इन स्क्रॉल्स को अपने साथ लेकर गांव-गांव जाते थे और कहानियां सुनाते थे, जिससे समुदायों के बीच संवाद स्थापित होता था और लोगों की जागरूकता भी बढ़ती थी। आज भी यह कला जीवित है और KNMA जैसी संस्थाएं इसे आधुनिक व्यापक दर्शक वर्ग तक ले जाने का कार्य कर रही हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि पटचित्र कला न केवल एक लोककला की गहनता प्रस्तुत करती है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव के लिए भी एक प्रेरणादायक माध्यम रही है। प्रदर्शनी ‘‘पाटा देखाबो?’’ इसी विरासत को संरक्षण और समृद्धि प्रदान करती है।

यह आयोजन कला प्रेमियों, इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जहां वे दिखाए गए स्क्रॉल्स और कथाओं के माध्यम से भारतीय कलात्मक एवं सामाजिक इतिहास को गहराई से समझ सकते हैं।

इस प्रदर्शनी की सफलता से स्पष्ट होता है कि डिजिटल युग के बावजूद परंपरागत माध्यमों की शक्ति और प्रभाव आज भी कम नहीं हुआ है। पटचित्र के ये संवाद आज भी लोगों के दिलों और दिमागों को जोड़ने में कोषिशरत हैं।

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Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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