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पुराने घरों की दीवारें इतनी मोटी क्यों होती थीं? वजह जानकर कहेंगे- उस दौर की इंजीनियरिंग थी कमाल!

नई दिल्ली: अगर आपने कभी किसी पुराने किले, हवेली या गांव के पुराने मकान को देखा होगा, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी कि उनकी दीवारें आज के घरों की तुलना में काफी मोटी होती थीं। कई जगह तो इन दीवारों की मोटाई डेढ़ से दो फीट तक भी देखने को मिलती है। आखिर पुराने समय में इतनी मोटी दीवारें बनाने की जरूरत क्यों पड़ती थी? इसके पीछे सिर्फ मजबूती ही नहीं, बल्कि विज्ञान और पारंपरिक वास्तुकला की कई महत्वपूर्ण वजहें छिपी थीं।

1. बिना एसी के घर को ठंडा और गर्म रखने की तकनीक

पुराने समय में न तो एयर कंडीशनर होते थे और न ही हीटर। ऐसे में मोटी दीवारें प्राकृतिक तापमान नियंत्रक (Natural Insulation) का काम करती थीं। गर्मियों में ये दीवारें बाहर की गर्मी को आसानी से अंदर नहीं आने देती थीं, जिससे घर अपेक्षाकृत ठंडा रहता था। वहीं, सर्दियों में घर के अंदर की गर्माहट लंबे समय तक बनी रहती थी। यही कारण था कि पुराने घर हर मौसम में आरामदायक माने जाते थे।

2. पूरी छत का भार दीवारों पर होता था

आज अधिकांश मकान आरसीसी (RCC) फ्रेम और कंक्रीट के पिलर पर आधारित होते हैं, इसलिए दीवारें अपेक्षाकृत पतली बनाई जा सकती हैं। लेकिन पुराने समय में भवन लोड-बेयरिंग स्ट्रक्चर पर आधारित होते थे। यानी छत, लकड़ी की बीम और पूरे ढांचे का भार सीधे दीवारों पर पड़ता था। इसलिए दीवारों को मोटा और मजबूत बनाना जरूरी होता था, ताकि वे वर्षों तक वजन सहन कर सकें।

3. निर्माण सामग्री की मजबूती बढ़ाने का तरीका

उस दौर में आधुनिक सीमेंट, स्टील और आरसीसी जैसी तकनीक उपलब्ध नहीं थी। घरों के निर्माण में मिट्टी, चूना, गारा, पत्थर और कच्ची या पक्की ईंटों का इस्तेमाल किया जाता था। इन सामग्रियों की मजबूती बढ़ाने के लिए दीवारों की मोटाई अधिक रखी जाती थी, जिससे भवन अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बन सके।

4. शोर और मौसम से प्राकृतिक सुरक्षा

मोटी दीवारें सिर्फ मजबूती ही नहीं देती थीं, बल्कि बाहर का शोर भी काफी हद तक रोकती थीं। इसके अलावा तेज धूप, बारिश, आंधी और तापमान में बदलाव का असर भी घर के अंदर कम महसूस होता था। यही वजह है कि पुराने घरों में बिना किसी आधुनिक तकनीक के भी प्राकृतिक आराम मिलता था।

5. पीढ़ियों तक टिकने वाला निर्माण

पुराने समय में घर केवल एक-दो पीढ़ियों के लिए नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे। मजबूत नींव और मोटी दीवारों के कारण ऐसे मकान दशकों ही नहीं, बल्कि कई बार सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित बने रहते थे। आज भी देश के कई पुराने मकान, हवेलियां और किले इसकी मिसाल हैं।

आज की तकनीक क्यों अलग है?

वर्तमान समय में भवन निर्माण तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है। अब स्टील, सीमेंट, आरसीसी फ्रेम, कॉलम और बीम की मदद से मजबूत ढांचे तैयार किए जाते हैं। इसलिए दीवारों को मोटा बनाने की आवश्यकता पहले जैसी नहीं रह गई है। हालांकि, ऊर्जा दक्ष (Energy Efficient) भवनों में आज भी बेहतर इंसुलेशन के लिए विशेष निर्माण सामग्री का उपयोग किया जाता है।

पुराने घरों की मोटी दीवारें केवल निर्माण की मजबूरी नहीं थीं, बल्कि उस समय की बेहतरीन इंजीनियरिंग, स्थानीय जलवायु की समझ और टिकाऊ वास्तुकला का उदाहरण थीं। सीमित संसाधनों के बावजूद उस दौर के कारीगर ऐसे घर बनाते थे, जो मौसम के अनुकूल, मजबूत और लंबे समय तक टिकाऊ साबित होते थे।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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