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‘संविधान की ऐसी व्याख्या नहीं हो सकती जिससे पाप को बढ़ावा मिले’, सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना यूबीटी की बड़ी दलील

नई दिल्ली, दिल्ली

शिवसेना में विभाजन, विधायकों की अयोग्यता और पार्टी के नाम-चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। मामले की सुनवाई के दौरान शिवसेना (यूबीटी) ने दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य को लेकर महत्वपूर्ण दलील दी। उद्धव ठाकरे गुट ने कहा कि संविधान के प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे उसी राजनीतिक दलबदल को बढ़ावा मिले, जिसे रोकने के लिए कानून बनाया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।

चुनाव आयोग के फैसले से जुड़ा है विवाद

मामला चुनाव आयोग के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया था। आयोग ने शिंदे गुट को पार्टी का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न भी दिया था।

उद्धव ठाकरे गुट ने आयोग के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि पार्टी में हुए राजनीतिक विभाजन और विधायकों की स्थिति को संविधान तथा दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत किस तरह देखा जाए।

कपिल सिबल ने रखी दलील

सुनवाई के पांचवें दिन शिवसेना (यूबीटी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत से कहा कि पार्टी में फूट पड़ना और अयोग्यता का सवाल अलग-अलग विषय हैं।

सिबल ने दलील दी कि अयोग्यता के मामले में बाद की घटनाओं पर विचार किया जा सकता है, लेकिन बाद की घटनाओं के आधार पर यह तय नहीं किया जाना चाहिए कि पार्टी में फूट वास्तव में हुई थी या नहीं।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की व्याख्या करते समय दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर कानून का मकसद राजनीतिक दलबदल पर रोक लगाना है, तो उसकी व्याख्या ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे दलबदल को ही फायदा पहुंचने लगे।

दलबदल विरोधी कानून क्यों महत्वपूर्ण?

दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। इसका संबंध संविधान की दसवीं अनुसूची से है, जिसमें कुछ परिस्थितियों में दल बदलने वाले सांसदों और विधायकों की अयोग्यता का प्रावधान है।

शिवसेना (यूबीटी) की दलील इसी व्यापक उद्देश्य पर आधारित है। उद्धव गुट का कहना है कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते समय यह देखना जरूरी है कि कानून जिस बुराई को रोकना चाहता है, व्याख्या से वही मजबूत न हो जाए।

सुप्रीम कोर्ट के सामने संवैधानिक सवाल

मामले में पार्टी के भीतर विभाजन, विधायकों की अयोग्यता, दलबदल विरोधी कानून और चुनाव आयोग के अधिकार से जुड़े कई प्रश्न हैं। इसलिए सुनवाई केवल शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है।

अदालत के सामने यह भी सवाल है कि पार्टी में राजनीतिक विभाजन और अयोग्यता के निर्धारण के लिए घटनाओं को किस क्रम और किस कानूनी कसौटी पर देखा जाए।

शिवसेना (यूबीटी) की दलील का मूल संदेश यह है कि संविधान और कानून की व्याख्या करते समय उनके उद्देश्य को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। अब मामले में आगे होने वाली सुनवाई पर दोनों गुटों के साथ-साथ राजनीतिक दलों की नजर भी बनी हुई है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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