दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

यूक्रेन युद्ध से बदली पोलैंड की रणनीति, बनाएगा अपना सैन्य सैटेलाइट नेटवर्क; भारत की तैयारी क्या है?

वारसॉ, पोलैंड

रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध में संचार की भूमिका को लेकर दुनिया के सामने कई महत्वपूर्ण सबक रखे हैं। ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के साथ सैटेलाइट आधारित संचार ने भी संघर्ष के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब पोलैंड इसी अनुभव को अपनी रक्षा नीति में शामिल करते हुए एक स्वतंत्र सैन्य सैटेलाइट संचार प्रणाली विकसित करने की तैयारी कर रहा है।

पोलिश प्रधानमंत्री डोनल्ड टस्क ने प्रस्तावित प्रणाली को संभावित ‘पोलिश स्टारलिंक’ बताया है। टस्क के अनुसार, रूसी-यूक्रेनी युद्ध पर नजर रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह समझ सकता है कि संचार आधुनिक युद्धक्षेत्र में कितना निर्णायक है। युद्ध के दौरान सैनिकों, कमांड सेंटर और अन्य सैन्य इकाइयों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखना अभियानों की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होता है।

इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए पोलैंड ने फिनलैंड की सैटेलाइट कंपनी आईसीईवाईई और राज्य नियंत्रित रक्षा क्षेत्र की कंपनी पीजीजेड के साथ साझेदारी की है। दोनों कंपनियों ने 9 सितंबर को कील्स में आयोजित एमएसपीओ डिफेंस शो में लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए।

योजना के अनुसार, आईसीईवाईई इस परियोजना की तकनीकी भागीदार होगी। वह सैटेलाइट आर्किटेक्चर विकसित करने, उपग्रहों के निर्माण और उनके संचालन में योगदान देगी। दूसरी ओर, पीजीजेड पोलैंड में इस कार्यक्रम के लिए घरेलू औद्योगिक आधार तैयार करने की जिम्मेदारी निभाएगी।

पोलैंड की योजना इस कार्यक्रम को 2026 से 2030 के बीच लागू करने की है। प्रस्तावित नेटवर्क वितरित सैटेलाइट आर्किटेक्चर पर आधारित होगा। इसका उद्देश्य ऐसी प्रणाली तैयार करना है, जिसे पोलैंड अपनी जरूरतों के अनुसार स्वतंत्र रूप से विकसित और संचालित कर सके।

स्टारलिंक ने यूक्रेन में क्या भूमिका निभाई?

यूक्रेन युद्ध के दौरान स्टारलिंक टर्मिनलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। यूक्रेनी सेना ने इनका इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में संचार बनाए रखने और कुछ ड्रोन अभियानों के लिए किया। जमीनी संचार ढांचे पर दबाव या नुकसान की स्थिति में सैटेलाइट आधारित नेटवर्क ने एक वैकल्पिक कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई।

इस अनुभव से यह भी सामने आया कि सैन्य अभियानों के लिए किसी बाहरी संचार नेटवर्क पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए पोलैंड अपनी घरेलू क्षमता विकसित करने पर जोर दे रहा है।

भारत की क्या है तैयारी?

भारत ने सैन्य सैटेलाइट संचार के क्षेत्र में काफी पहले से काम शुरू कर रखा है। भारतीय सशस्त्र बलों के लिए समर्पित संचार उपग्रहों और अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचार क्षमताओं का विकास किया गया है। इससे सेना की संचार जरूरतों को मजबूत करने के साथ कमांड और नियंत्रण नेटवर्क को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

भारत के पास अंतरिक्ष क्षेत्र में मजबूत संस्थागत और तकनीकी आधार भी है। आने वाले वर्षों में सुरक्षित संचार, एंटी-जैमिंग क्षमता, अधिक लचीले नेटवर्क और सैन्य उपग्रहों की संख्या बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

पोलैंड का फैसला इस व्यापक बदलाव का संकेत है कि अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक या वाणिज्यिक गतिविधियों का क्षेत्र नहीं रहा। आधुनिक रक्षा रणनीति में सैटेलाइट संचार तेजी से राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!