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इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के अधिकारी ने कहा कि ट्रिश्ना सैटेलाइट विकास के अंतिम चरण में है

इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के अधिकारी ने कहा कि ट्रिश्ना सैटेलाइट विकास के अंतिम चरण में है

नई दिल्ली। भारत और फ्रांस के सहयोग से विकसित किए जा रहे तीसरे उपग्रह ट्रिश्ना की प्रगति तेजी से हो रही है। इस उपग्रह को मेघा-ट्रॉपिक्स और साराल उपग्रहों के बाद विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य जलवायु विज्ञान और पारिस्थितिकी पर बेहतर अध्ययन करना है।

इस विकास के बारे में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि ट्रिश्ना उपग्रह वर्तमान में अंतिम चरण में है। इसरो और फ्रांसीसी अंतरिक्ष संस्थान के बीच सहयोग से यह उपग्रह महासागर और जलवायु सम्बंधी डेटा एकत्र करने में सहायक होगा।

मेघा-ट्रॉपिक्स और साराल उपग्रहों के सफल संचालन के बाद, ट्रिश्ना परियोजना को विशेष महत्व दिया जा रहा है क्योंकि यह विशेष उपकरणों से लैस होगा जो समुद्री जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालने वाले कारकों का विश्लेषण करेंगे। यह उपग्रह मौसम की भविष्यवाणी, समुद्र की सतह के तापमान, और समुद्री जैव विविधता पर नए तथ्य प्रदान करेगा।

इस उपग्रह के अंतर्गत समुंदर की सतह से लेकर वायुमंडल तक के विस्तृत डेटा संग्रह की योजना है, जिससे भारतीय और वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहतर समझ विकसित होगी। इसके जरिये विभिन्न पर्यावरणीय पहलुओं पर शोध को गति मिलेगी और इससे नीति निर्धारकों को भी मदद मिलेगी।

इसरो का कहना है कि ट्रिश्ना का सफल प्रक्षेपण भारत और फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उदाहरण के रूप में देखा जाएगा। यह उपग्रह जल विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन के क्षेत्र में दोनों देशों के लिए नई दिशा और अवसरों का सूत्रपात करेगा। भारत की स्पेस टेक्नोलॉजी की ताकत और फ्रांस की वैज्ञानिक विशेषज्ञता के संयोजन से ट्रिश्ना उपग्रह अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा।

ट्रिश्ना के जरिए प्राप्त डेटा से न केवल वैज्ञानिक समुदाय को लाभ मिलेगा, बल्कि इससे समुद्री और पर्यावरणीय सुरक्षा के महत्व को भी और अधिक बढ़ावा मिलेगा। कहा जा सकता है कि इस उपग्रह की सफलता भारत की अंतरिक्ष वैज्ञानिक क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने में सहायक बनेगी।

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