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अंटार्कटिका की बर्फ घटने से महासागरों में बढ़ रही लवणता, ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ने की आशंका

 

बेंगलुरु, कर्नाटक।

अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ की मात्रा में आई गिरावट का असर अब महासागरों की संरचना पर दिखाई देने लगा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2015 के बाद दक्षिणी महासागर के कुछ हिस्सों में मीठे पानी की उपलब्धता से जुड़ा पुराना रुझान बदल गया है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र का पानी अधिक खारा और घना हो रहा है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इस बदलाव से समुद्र की कार्बन को अपने भीतर जमा रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि का खतरा बढ़ सकता है।

यह अध्ययन विज्ञान पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है। इसमें भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), मेलबर्न विश्वविद्यालय और साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भाग लिया। वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक इंटरमीडिएट वाटर (AAIW) में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया। यह पानी दक्षिणी महासागर में बनता है और सतह से सैकड़ों मीटर नीचे बहते हुए अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागरों के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचता है।

समुद्री बर्फ घटने से क्यों बदल रही पानी की प्रकृति?

अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ बनने और पिघलने की प्रक्रिया महासागर में मीठे पानी की मात्रा को प्रभावित करती है। समुद्री बर्फ बनने के दौरान नमक का बड़ा हिस्सा आसपास के पानी में रह जाता है, जबकि बर्फ पिघलने पर अपेक्षाकृत मीठा पानी समुद्र में मिलता है। इससे समुद्र की ऊपरी परत में ठंडे और कम खारे पानी की स्थिति बन सकती है।

हालांकि, वर्ष 2015 के बाद समुद्री बर्फ में आई गिरावट ने इस प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है। बर्फ कम बनने और पिघलने के बदलते स्वरूप के कारण समुद्र की सतह पर मीठे पानी की उपलब्धता का संतुलन बदल रहा है। इसके साथ ही गहराई में मौजूद गर्म और खारे पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया भी इस बदलाव में योगदान दे सकती है।

गहरे समुद्र में जमा कार्बन पर पड़ सकता है असर

महासागर पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके उसका एक हिस्सा गहराई में जमा रखते हैं। पानी की लवणता, तापमान और घनत्व में बदलाव समुद्र की परतों के बीच पानी के आवागमन को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि समुद्र की यह प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर होती है, तो गहरे पानी में जमा कार्बन के आदान-प्रदान पर असर पड़ सकता है। इससे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रभावित होने की आशंका है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अंटार्कटिका में होने वाले बदलावों का प्रभाव केवल ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता। दक्षिणी महासागर से जुड़ी जलधाराएं इन प्रभावों को दुनिया के दूसरे महासागरों तक पहुंचा सकती हैं। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग पर इसके वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए आगे भी वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।

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