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मनुस्मृति पर हमेशा विवाद क्यों??

 

 

 

 

 

●महिलाओं और निचली जातियों को समानता का अधिकार नही…

25 दिसंबर 1927 को डॉ. आम्बेडकर ने मनुस्मृति को जलाया था

 

जब-जब हम मनुस्मृति शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में यह सवाल उठता है कि आखिर मनुस्मृति क्या है, जिसपर विवाद खड़े होते रहते हैं। मनुस्मृति हिंदू धर्म का एक प्राचीन धर्मशास्त्र है. यह संस्कृत में लिखे गए कई धर्मग्रंथों में पहला ग्रन्थ है जिसे अंग्रेजों ने कानूनी संहिता भी माना था। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2684 श्लोक हैं. हालांकि कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2964 बताई जाती है।

विलियम जोन्स ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया….

भारत आए भाषाविद् सर विलियन जोन्स ने संस्कृत से इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया। ये सबसे पहली ऐसी किताब थी, जिसका न केवल ट्रांसलेशन हुआ, बल्कि उसका प्रचार-प्रसार भी जमकर किया गया।इसके पीछे भी ईस्ट इंडिया कंपनी की डिवाइड एंड रूल नीति को देखा जाता है। कई विद्वानों का मत है कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ कोलकाता के जज की तरह काम करता यह ब्रितानी व्यक्ति जानता था कि कैसे भारतीयों को धर्म और वर्ण व्यवस्था के आधार पर एक दूसरे से अलग किया जा सकता है।

ब्रितानियों ने बनाया इसे कानूनी आधार…

 

एक संत व राजनैतिक छवि के मशहूर व्यक्ति राजीव लोचन मनुस्मृति के इतिहास को समझाते हुए कहते हैं, “जब ब्रितानी लोग भारत आए तो उन्हें लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है। ब्रितानी कानून ने इसे सुनवाई के आधार मान लिया था। यानि इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई होती थी। इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है।”

मनु पहले मानव सब उनकी संतान…

ग्रन्थ व शास्त्रों की मानें तो महर्षि मनु मानव संविधान के पहले प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं।मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या फिर मनुष्य कहा गया। यानी सभी मनुष्य मनु की ही संतान है और सृष्टि के समस्त प्राणियों में मनुष्य एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृ‍ति में समाज संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं बताई है, उसे मनुवाद कहा जाता है।

12 अध्यायों का संकलन है मनुस्मृति

मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं अलग-अलग अध्यायों में अलग-अलग वर्णन हैं जो निम्न हैं..

●पहला अध्याय: प्रकृति का निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशे और ब्राह्मणों की महानता आदि जैसे विषय शामिल हैं.

●दूसरा अध्याय: ब्रह्मचर्य और मालिक की सेवा पर आधारित है.

●तीसरा अध्याय: विवाद के किस्म, रीति-रिवाज और श्राद्ध का वर्णन है.

●चौथा अध्याय: गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, भोजन करने, भोजन न करने के नियम समेत 21 तरह के नरक का जिक्र मिलता है।

●पांचवा अध्याय: महिलाओं के कर्तव्य, शुद्धता और अशुद्धता आदि के बारे में जिक्र मिलता है.

●छठा अध्याय: एक संत के बारे में बताया गया है।

●सातवां अध्याय: राजा के कर्तव्यों के बारे में बताया गया है।

●आठवां अध्याय: अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि के बारे में बताया गया है.

●नौवां अध्याय: पैतृक संपत्ति का वर्णन किया गया है.

●दसवां अध्याय: वर्णों के मिश्रण की बात करता है.

●ग्यारहवां अध्याय: पापकर्म के बारे में बताया गया है.

●बारहवां अध्याय: तीन गुणों और वेदों की प्रशंसा समाहित है.

 

कुलीन वर्णों को प्राथमिकता…

मनुस्मृति ने शूद्रों के शिक्षा पाने के अधिकार को खारिज कर दिया था। शिक्षा देने की विधि मौखिक हुआ करती थी।ऐसे में कुछ ब्राह्मणों को छोड़कर कोई ये नहीं जानता कि अन्य वर्णों को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जाता था।यही नही मनुस्मृति में महिलाओं को पिता व पति की आश्रित की दृष्टि से देखा गया है।

राजीव लोचन बताते हैं, “महात्मा ज्योतिबा फुले मनुस्मृति को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे। खेतिहर मजदूरों, सीमांत किसान और समाज के दूसरे वंचित और शोषित तबकों की सोचनीय हालत देखकर उन्होंने ब्राह्मणों और व्यापारियों की आलोचना की।”

आंबेडकर ने जलाया था मनुस्मृति…

. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले में (वर्तमान में रायगड) के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया.
आंबेडकर अपनी किताब ‘फ़िलॉसफ़ी ऑफ हिंदूइज़्म’ में लिखते हैं, “मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी। मनु ने इन चार वर्णों को अलग-अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी. हालांकि, ये नहीं कहा जा सकता है कि मनु ने जाति व्यवस्था की रचना की है. लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज ज़रूर बोए थे।”

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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