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सिस्टम से सवाल पूँछती वर्दी..पुलिस पर बढ़ते अत्याचार माफिया और सिस्टम का पॉलिटिकल कनेक्शन??

सिस्टम से सवाल पूँछती वर्दी..??
ए एसआई हुए हिंसा के शिकार

छतरपुर में टीआई ने खुद को गोली मारी
●इंदौर में पुलिस के खिलाफ वकीलों का मोर्चा
●मऊगंज में एएसआई की हत्या
●शहडोल में भी हुई थी हत्या

 

एक सभ्य व सुरक्षित समाज की कल्पना में शायद पुलिस की भूमिका को नकारा नही जा सकता.वर्दी ही समाज मे फैले अपराध व अपराधियों से आम जनता को सुरक्षा के माकूल व्यवस्था मुहैया कराती है. किंतु सिस्टम के आगे बौने अब नौकरशाह भी राडार में आ रहे हैं और निरंकुशता के शिकार हो रहे हैं।बीते दिनों मऊगंज में हुई घटना ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा कर दिया है की सरकार और जनता की दिन रात प्रहरी लगाने वाली वर्दी ही असुरक्षित क्यों.??
क्या अब आमजनमानस के मन मे पुलिस के प्रति भय नही है या फिर कहीं वर्दी से ही अपनी इमेज को बरकरार रखने में चूक हो रही है।एमपी में पुलिसवालों पर हुए हमले की लिस्ट को देखा जाए तो यह सवाल मन में आता ही है। इस लिस्ट में एमपी के मऊगंज का नाम भी शामिल हो गया है। शनिवार की रात हुए दो गुटों के बवाल में एक ASI और एक नागरिक की मौत हो गई।
रीवा के मऊगंज जिले का गड़रा गांव, जो कभी अपनी शांत पहचान के लिए जाना जाता था, अब एक ऐसी दर्दनाक घटना का गवाह बन गया है, जिसने कानून व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए। शनिवार को इस छोटे से गांव में हिंसा की ऐसी आग भड़की कि एक युवक और एक पुलिस अधिकारी की जान चली गई, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

यहाँ से शुरू होती है कहानी…

दरअसल, यह पूरा मामला एक आदिवासी परिवार और एक ब्राह्मण युवक के बीच हुए विवाद से, जो देखते ही देखते सामुदायिक संघर्ष में बदल गया। जब पुलिस ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो हालात और बेकाबू हो गए—पथराव, मारपीट और एक ऐसी त्रासदी, जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया और पूरे प्रदेश में वर्दी की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए।

होती रही हैं घटनाएँ, नही थमा वारदातों का सिलसिला…

तकरीबन एक वर्ष पूर्व छतरपुर में थाने पर हमला हो या खरगोन में अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पुलिस पर डंडों से प्रहार हो या ग्वालियर में जुए की सूचना पर बदमाश ने ASI का सिर फोड़ दिया, भिंड में भी माफिया पुलिसवालों पर हमले कर देते हैं। शहडोल में खनन माफियाओं ने एएसआई की जान ले ली। ये घटनाएं बताती हैं कि प्रदेश में कानून के रखवालों की राह आसान नहीं है।
इन घटनाओं को देखकर यह बात सामने आती है कि अपराधियों की निरंकुशता दूसरा पुलिस की अपनी खुद की लचर व्यवस्था तीसरा सिस्टम और माफियाओं का पुलिस पर पॉलिटकल अप्रोच।

क्या है इसका हल…

मध्य प्रदेश में पुलिस पर हमले सिर्फ अपराध की घटनाएं नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक बीमारी का लक्षण हैं। यह बीमारी है अविश्वास, अशिक्षा और हिंसा को हल मानने की मानसिकता। इसे ठीक करने के लिए पुलिस को सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन बनाना होगा, वहीं सरकार और समाज को मिलकर जड़ तक जाना होगा। नहीं तो हर बार पत्थरों और गोलियों के बीच कोई न कोई जान गंवाता रहेगा – चाहे वह पुलिसकर्मी हो या आम नागरिक।
सुरक्षा की जिम्मेवारी न सिर्फ पुलिस की है बल्कि सरकार समेत आम इंसान का वर्दी के प्रति सम्मान व वर्दी का आम इंसान के प्रति सहज व्यवहार.

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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