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एमपी के मेडिकल कॉलेजों में बन रहे ‘हाफ डॉक्टर’

मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी का खुलासा

मध्य प्रदेश में मेडिकल शिक्षा की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। हाल ही में की गई जांच और निरीक्षण रिपोर्टों में सामने आया है कि प्रदेश के 19 सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में से 7 संस्थान बेहद खराब हालत में चल रहे हैं। यहां न तो पर्याप्त फैकल्टी है और न ही मेडिकल छात्रों के लिए जरूरी प्रैक्टिकल लैब की व्यवस्था।

चिकित्सा शिक्षा का मूल आधार सिद्धांत और प्रैक्टिकल का संयुक्त अध्ययन होता है। लेकिन इन कॉलेजों में हालात ऐसे हैं कि छात्र ऑपरेशन थियेटर, एनाटॉमी लैब या क्लीनिकल प्रैक्टिस के अनुभव के बिना ही आगे बढ़ रहे हैं। जिन कॉलेजों में फैकल्टी है, वहां संख्या बहुत कम है, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रभावित हो रहा है। कई विषयों के लिए नियमित कक्षाएं तक नहीं लग पा रहीं।

सबसे गंभीर स्थिति उन छात्रों की है जो डॉक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें सही माहौल ही नहीं मिल रहा। बुनियादी मेडिकल उपकरण, मॉडल, कैडवर, लैब टेस्टिंग सुविधाएँ और क्लीनिकल प्रैक्टिस की कमी ने उन्हें ऑनलाइन वीडियो, नोट्स और डिजिटल सामग्री तक सीमित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल ऑनलाइन ज्ञान से डॉक्टर तैयार नहीं किए जा सकते, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि कई कॉलेजों में एमसीआई और एनएमसी के निर्धारित मानकों का पालन तक नहीं हो रहा है। प्रशासनिक लापरवाही और संसाधनों की भारी कमी के कारण छात्र अधूरी जानकारी और अनिश्चित भविष्य के साथ पढ़ाई कर रहे हैं।

चिकित्सा शिक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो प्रदेश में ‘हाफ डॉक्टर’ तैयार होंगे, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। सरकार और विभाग स्तर पर सुधार की मांग भी तेज हो रही है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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