सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस बात पर हैरानी जताई कि वनों और झीलों से जुड़े सभी मामले हाईकोर्ट को दरकिनार कर उच्चतम न्यायालय में क्यों आ रहे हैं, वह भी 1995 की लंबित जनहित याचिका में अंतरिम आवेदनों के रूप में।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस परिपाटी पर सवाल उठाया। सुखना झील मामले से संबंधित एक आवेदन पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआइ ने कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कुछ निजी डेवलपर्स और अन्य के इशारे पर ‘फ्रेंडली मैच’ चल रहा है।

उन्होंने कहा कि सुखना झील पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट से बमुश्किल 500 मीटर की दूरी पर है और हम संविधान के अनुच्छेद 226 के जरिये हाईकोर्ट का अधिकार छीनकर यहां मामला सूचीबद्ध कर रहे हैं।

बेहद अहम हैं सुप्रीम की ये टिप्पणी

सीजेआइ की टिप्पणियां इसलिए अहम है क्योंकि पूर्व सीजेआइ बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सहित पिछली कई सुप्रीम कोर्ट की पीठें देश भर में आरक्षित वनों, झीलों, बाघ अभयारण्यों आदि के संबंध में कानूनों के उल्लंघन से जुड़े अंतरिम आवेदनों (आइए) पर कई निर्देश, आदेश और निर्णय पारित करती रही हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ”हमें बताइए कि हितधारक कौन हैं। हम देखना चाहते हैं कि क्या जलग्रहण क्षेत्र संरक्षित है और राज्य द्वारा सुधारात्मक उपाय किए गए हैं। राज्य का कहना है कि हमने निर्णय ले लिया है और अब केंद्र निर्णय लेगा।”सीजेआइ ने कहा, ”हम जानते हैं कि सुखना झील के जलग्रहण क्षेत्र को किस प्रकार व्यवस्थित रूप से अवरुद्ध किया गया है।”

पहले एचसी जाने चाहिए ये मामले: SC

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय उस समय कार्रवाई नहीं करते जब उन्हें सूचित किया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट मामले पर विचार कर रहा है। पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एमिकस क्यूरी परमेश्वर से कहा कि वे स्थानीय मुद्दों से अवगत कराएं, जिन्हें उच्च न्यायालय स्वयं निपटा सकते हैं। सीजेआइ ने कहा कि ये समस्या पूरे देश में देखी जा रही है। अदालत को कुछ निर्देश जारी करने पड़ेंगे।