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अडानी के रेलवे कॉरिडोर भूमि अधिग्रहण पर सामाजिक जनसुनवाई सवालों के घेरे में

अडानी के रेलवे कॉरिडोर भूमि अधिग्रहण पर सामाजिक जनसुनवाई सवालों के घेरे में

15 किमी क्षेत्र, 8 ग्राम पंचायतें, सैकड़ों प्रभावित एक स्थान पर औपचारिकता में सिमटी जनसुनवाई
अनूपपुर।

(विनय मिश्रा की रिपोर्ट)

आप अगर अदाणी समूह और उनके संचालक को जानते हैं तो आपको अदाणी समूह और उनके कारोबार को धरातल पर जानना भी अत्यावश्यक हो जाता है अगर अदाणी समूह और उनके कारोबार को समझना है तो देश-दुनिया के जल,जंगल,जमीन पर हो रहे अधिग्रहण को ही समझ लीजिए। देश के जल,जंगल,जमीन और अडाणी समूह का फैला कारोबार बताता है कि अडाणी न सिर्फ देश-विदेश बल्कि प्रकृति के ऐसे चहेते हो चुके हैं जो जंगल,जल और आसमान (उत्तराखंड पर रोपवे) पर व्याप्त हो रहे हैं अब तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि “भगवत गीता” में कहा- जाने वाले श्रीकृष्ण के शब्द- हे पार्थ!मैं सर्वत्र हूँ इस पृथ्वी लोक में अडाणी समूह के लिए चरितार्थ हो रहा है। जहाँ सिर्फ एक समूह की कानून व्यवस्था है सरकारी व्यवस्था है और जनता की सुनवाई के लिए जनसुनवाई व्यवस्था है।

अडानी समूह की कंपनी अनूपपुर थर्मल पावर लिमिटेड द्वारा कोतमा क्षेत्र के छाती मझौली में स्थापित की जा रही 1640 मेगावाट विद्युत परियोजना के लिए प्रस्तावित कोयला परिवहन रेलवे कॉरिडोर के भूमि अधिग्रहण को लेकर आयोजित सामाजिक प्रभाव जनसुनवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि यह जनसुनवाई भारत सरकार के दिशा-निर्देशों और RFCTLARR Act, 2013 के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए मात्र औपचारिकता बनकर रह गई।
परियोजना के तहत कोतमा से छाती मझौली तक लगभग 15 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन बिछाई जानी है, जो 8 ग्राम पंचायतों से होकर गुजरेगी और जिससे सैकड़ों किसान व परिवार प्रभावित होंगे। इसके बावजूद सभी प्रभावित क्षेत्रों की अलग-अलग ग्राम सभाओं में जनसुनवाई कराने के बजाय एक ही स्थान पर सामूहिक सुनवाई आयोजित की गई, जिसे स्थानीय लोगों ने “लीपापोती” करार दिया।
कानून के प्रावधानों की अनदेखी का आरोप
भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम, 2013 के अनुसार:

● सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) अनिवार्य है
●SIA रिपोर्ट का मसौदा स्थानीय भाषा में पहले उपलब्ध कराया जाना चाहिए
●प्रभावित ग्राम सभाओं से परामर्श आवश्यक है
खसरा नंबर, प्रभावित भूमि की सूची और संभावित विस्थापन की जानकारी पहले दी जानी चाहिए
●स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अब तक न तो किसानों को खसरा नंबरों की जानकारी दी गई, न ही यह स्पष्ट किया गया कि किस किसान की कितनी भूमि अधिग्रहित होगी।

राजनीतिक व कानूनी विरोध तेज

कांग्रेस के पूर्व विधायक सुनील सराफ ने इस मुद्दे पर जन आंदोलन की चेतावनी दी है। वहीं जिला पंचायत सदस्य रिंकू राम जी मिश्रा ने कलेक्टर कार्यालय में लिखित व वैधानिक आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन और कंपनी प्रबंधन ने आपत्तियों की अनदेखी कर मनमानी ढंग से जनसुनवाई को आगे बढ़ाया, तो वे किसानों के हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेंगे।

किसानों में बढ़ता असंतोष,कम्पनी का चार्टर एक्ट फरमान

सूत्रों के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने किसानों के बीच असंतोष बढ़ा दिया है। प्रभावित लोगों का कहना है कि जनसुनवाई का उद्देश्य उनकी राय जानना और पुनर्वास से जुड़े सवालों का समाधान करना होता है, लेकिन यहां यह प्रक्रिया कानूनी औपचारिकता तक सीमित कर दी गई।
फिलहाल, जिले में यह मुद्दा प्रशासन, कंपनी और किसानों के बीच टकराव का रूप लेता दिख रहा है और आने वाले दिनों में इस पर कानूनी व राजनीतिक हलचल और तेज होने की संभावना है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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