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बीएमसी चुनाव 2024: मराठी राजनीति की असली परीक्षा

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के नतीजों ने इस बार मुंबई की राजनीति में कई पुराने राजनीतिक मिथकों को तोड़ दिया है। वर्षों से जिस ‘मराठी मानुष’ की राजनीति को मुंबई की सत्ता की कुंजी माना जाता रहा, वह इस चुनाव में अपेक्षित असर नहीं दिखा सकी। ठाकरे बंधुओं—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—ने चुनाव से पहले मराठी भाषा, मराठी पहचान और मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने के कथित खतरे को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन मतदाताओं ने इन भावनात्मक अपीलों से अलग रास्ता चुना।

🔹 चुनावी मुद्दों की दिशा

चुनाव प्रचार के दौरान ठाकरे बंधुओं ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह गैरमराठी व्यक्ति को मुंबई का मेयर बनाना चाहती है। भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह के बयान को लेकर इस मुद्दे को और हवा दी गई। मराठी बनाम गैरमराठी की बहस को केंद्र में रखकर मराठी मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश की गई। हालांकि, यह रणनीति शहर के बहुभाषिक चरित्र के सामने कमजोर साबित हुई।

🔹 नतीजों ने बदली राजनीतिक तस्वीर

227 सदस्यीय बीएमसी में इस बार रिकॉर्ड 80 गैरमराठी पार्षद चुने गए हैं, जो अब तक के चुनावों में सबसे अधिक हैं। इससे पहले 2017 में यह संख्या 72 थी। यह आंकड़ा बताता है कि मुंबई की जनता अब केवल भाषाई पहचान से नहीं, बल्कि व्यापक प्रतिनिधित्व और समावेशी राजनीति से जुड़ाव महसूस कर रही है।

🔹 किन दलों को मिला फायदा

इस चुनाव में गैरमराठी पार्षदों में सबसे अधिक संख्या भाजपा की रही। पार्टी ने विभिन्न भाषाई और सामाजिक वर्गों को टिकट देकर संतुलन साधा। इसके अलावा कांग्रेस, एआईएमआईएम और समाजवादी पार्टी के भी अधिकांश पार्षद गैरमराठी समुदाय से हैं। यह दर्शाता है कि गैरमराठी मतदाता किसी एक दल तक सीमित नहीं रहे और उन्होंने विकल्पों के आधार पर मतदान किया।

🔹 मराठी राजनीति की सीमाएं

मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाली पार्टियों—शिवसेना (यूबीटी), शिंदे गुट की शिवसेना और मनसे—को इस चुनाव में मराठी वोट बैंक के बिखराव का सामना करना पड़ा। एकजुट मराठी मतों की कमी ने इन दलों की स्थिति को कमजोर किया और उनके लिए बीएमसी में निर्णायक बढ़त हासिल करना कठिन हो गया।

🔹 मुंबई का सामाजिक यथार्थ

मुंबई देश की आर्थिक राजधानी होने के साथ-साथ एक वैश्विक शहर भी है। यहां देश के हर कोने से लोग आकर बसे हैं और शहर की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि मुंबई की राजनीति भी अब स्थानीय पहचान से आगे निकलकर महानगरीय सोच की ओर बढ़ रही है। मतदाता अब स्थिर प्रशासन, विकास और बुनियादी सुविधाओं को ज्यादा महत्व देने लगे हैं।

🔹 निष्कर्ष

बीएमसी चुनावों के नतीजे यह साफ संकेत देते हैं कि मराठी पहचान की राजनीति अब मुंबई में अकेले निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकती। बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच वही दल सफल होंगे जो सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की नीति अपनाएंगे। 80 गैरमराठी पार्षदों का चुना जाना इसी बदलती राजनीतिक सोच का सबसे बड़ा प्रमाण है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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