दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

युवा मोर्चा नियुक्ति में पहले तय नाम, औपचारिकता शेष

भाजपा में संगठन नहीं, अब सिर्फ समीकरण और पैसा?
युवा मोर्चा नियुक्ति में पहले तय नाम, औपचारिकता शेष

पहुँच गया चंदा, अब लिफाफे में नाम की रफू

शहडोल। विनय मिश्रा की कलम से..

बीते दिनों मप्र भाजपा युवा मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष का शहडोल आगमन हुआ प्रदेश अध्यक्ष के सामने युवाओं का हुजूम था तो कुछ अपने अपने खेमें को लेकर दिखा रहे थे कि अध्यक्ष जी मेरा पड़ला ज्यादा भारी है और मैं ही वो दावेदार हूँ जिसे युमो का जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है खैर ये संगठन की अपनी रणनती और समीकरण है पर एक बात जरूर है बीते कुछ वर्षों से भाजपा में जिस प्रकार से पदाधिकारियों का चयन हो रहा है इसमें कोई दो राय नही की अब भाजपा चयन प्रकिया में सिफारिश और डोनेशन को ज्यादा तवज्जो देती है।
बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया में कुछ नाम ट्रेंड हो रहे हैं पर जो नाम ट्रेंड हो रहे हैं उसमें कुछ तो क्षेत्रीय राजनीति और चंद क्षेत्रीय लोगों के मोहताज हैं उनके जिलास्तरीय या संगठन स्तरीय क्रियाकलापों का ग्राफ उठाया जाए तो पार्टी में बैठे चयनकर्ताओं को बोध हो जाएगा कि आज भाजपा में निष्ठावान कार्यकर्ताओं का नही बल्कि सिफारिश और चंदेदारों की जररूत है और वही असली पद और प्रतिष्ठा के दावेदार हैं।
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से खुद को कार्यकर्ताओं की पार्टी बताती रही है, लेकिन शहडोल में भाजपा युवा मोर्चा की नियुक्तियों को लेकर जो दावे अभी से सोशल मीडिया और राजनीतिक जानकारों के बीच हो रही है वह भाजपा युमो चयन प्रकिया पर अभी से प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है।
सूत्रों के अनुसार युवा मोर्चा के पदों के लिए नाम पहले ही तय कर लिए गए हैं और संगठनात्मक प्रक्रिया को केवल औपचारिकता निभाने के लिए दिखाया जा रहा है। जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी संगठन में अब विचारधारा और संघर्ष नहीं, बल्कि पैसा, जातीय समीकरण और राजनीतिक सिफारिश ही सबसे बड़ा मापदंड बन गया है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि युवा मोर्चा जैसे संगठनात्मक पदों का इस्तेमाल अब आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की राजनीतिक तैयारी के लिए किया जा रहा है। जिन नामों को आगे लाया जा रहा है, वे संगठन से अधिक चुनावी फंडिंग और स्थानीय राजनीतिक गणित के हिसाब से चुने जा जा रहे हैं।
पार्टी के भीतर उठ रही यह नाराजगी आने वाले समय मे भाजपा के लिए अंदरूनी राजनीतिक संकट बनेगी इस पर विचार की जरूरत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा इसी तरह जारी रहा तो इसका सीधा असर बूथ स्तर की मजबूती पर पड़ेगा, जो भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रही है।
आपको बता दें कि शहडोल में कुछ सक्रिय कार्यकर्ताओ के नाम सामने आए हैं जिनके बलबूते संगठन कभी भी बड़ा उलटफेर कर सकती है तो वही कोयलांचल से सिर्फ एक ही नाम ट्रेंड हो रहा है जिनके इर्दगिर्द चंद नुमाइंदों का एक जत्था है जिन्हें दोनों हाथों की मुट्ठी में बड़े आसानी से गिनाए जा सकते हैं।
खैर जो अधूरे वाटरपार्क की संरचना में मुख्यमंत्री को स्वीमिंग करा सकते हैं वो जिलाध्यक्षी की रेस में उड़ते नामों को भी खारिज करा सकते हैं।
सवाल है जो हमारे नही आम जनता और कार्यकर्ताओं के हैं कि- क्या भाजपा अब कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रही?
क्या संगठन में विचारधारा की जगह पैसा और सत्ता का गणित हावी हो गया है?
और क्या युवा मोर्चा को राजनीतिक निवेश का मंच बना दिया गया है?

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!