दिव्यकीर्ति सम्पादक-दीपक पाण्डेय, समाचार सम्पादक-विनय मिश्रा, मप्र के सभी जिलों में सम्वाददाता की आवश्यकता है। हमसे जुडने के लिए सम्पर्क करें….. नम्बर-7000181525,7000189640 या लाग इन करें www.divyakirti.com ,

भारतीय गर्मियों में देसी अंदाज में ठंडक बनाएं रखें

Be cool and stay cool in Indian summers - Desi style

भारत में वेस्टर्न सूट का स्थान और देसी कपड़ों का महत्व

भारत आज एक विकसित और उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, लेकिन देश में कामकाजी पोशाक के तौर पर अभी भी पश्चिमी सूट का प्रचलन व्यापक है। यह पोशाक वाकई में आरामदायक भी हो सकती है, लेकिन क्या यह हमारे देश की जलवायु और संस्कृति के अनुरूप है, यह सवाल उठता है। पश्चिमी सूट की शुरुआत यहाँ यूरोपीय व्यापारियों के आने के समय हुई थी, जिन्होंने इस पोशाक को एक आधुनिकता के प्रतीक के रूप में पेश किया। परंतु, क्या यह उपयुक्त था जब हमारे यहां की जलवायु गरम और आर्द्र होती है?

इतिहास में देखें तो भारत के पहले समय से ही सूती कपड़े का उपयोग होता रहा है, जो पतले और फुर्तीले होते हैं। यह स्थानिक परिधान न केवल हमारे संस्‍कारों का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि गर्मी में ठंडक और आराम भी प्रदान करते हैं। भारत की गर्मी में भारी और फिटेड सूट पहनना एक प्रकार की असुविधा बन जाता है जो शरीर को गर्मी से निजात नहीं दिला पाता। साथ ही, सूती कपड़े की खासियत होती है कि यह हवा को गुजरने देता है और शरीर को ठंडा रखता है।

आज का भारत केवल एक विशाल बाजार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था ही नहीं है, बल्कि यह अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी समेटे हुए है। समय आ गया है कि हम अपने रोजगार का रोज़गार और कार्यालयों के पोशाक के तौर पर देसी कपड़ों को अपनाएं। जैसे कि सूती कुर्ता-पायजामा, धोती या हल्के रंग के कपड़े, जो न केवल हमारे पारंपरिक पहनावे का हिस्सा हैं, बल्कि आरामदायक भी हैं।

परंतु, कई बार कारोबार और ऑफिस कल्चर के चलते लोग पश्चिमी पोशाक को प्राथमिकता देते हैं, जो शायद लोगों के लिए सहजता और आधुनिकता का प्रतीक बन गया है। यह सोच बदलना जरूरी है कि आधुनिकता केवल पश्चिमी पोशाक से ही आती है। हमारी संस्कृति के अनुरूप कपड़ों को अपनाकर हम न केवल पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी होंगे, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतरीन विकल्प मिलेगा।

निष्कर्ष

अतः यह आवश्यक है कि भारत अपने स्थानीय कपड़ों को समर्पित करे और गर्मी के मौसम में हल्के, फुर्तीले और सूती कपड़ों को अपनाए। हमारे पूर्वजों ने जो पहनावा विकसित किया था, वह जलवायु के हिसाब से उपयुक्त था। आज भी हम उस विरासत को नए समय के अनुरूप बना सकते हैं और देसी पहनावे को कार्यस्थलों पर सामान्य कर सकते हैं। ऐसा करने से न केवल हम अपनी सांस्कृतिक पहचान कायम रखेंगे, बल्कि घरेलू कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। भारतीय कार्यस्थलों में देसी पोशाक को अपनाने का सिलसिला शुरू होना चाहिए, जो हमारे देश की गरमाहट को मात देने का सही तरीका है।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

ये भी पढ़ें...

error: Content is protected !!