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मप्र में सचिव, रोजगार सहायक और मोबलाइजर वेतन पर संकट, सालों से वेतन पर लगा फफूँद

मध्य प्रदेश में सचिव और रोजगार सहायक के वेतन पर संकट, तीन माह से वेतन के लिए तरस रहे कर्मचारी

भोपाल । विनय मिश्रा की रिपोर्ट…   

मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण मंत्रालय में कुछ महीनों से तनख्वाह नामक मिठाई पर फफूंद लगा हुआ है जहाँ सरकार की कोष से निकलने वाले कर्मचारियों का वेतन बीते कुछ माह से अधर में लटका हुआ है वही रोजगार सहायकों का वेतन सरकार आधा अधूरा देकर उनसे काम ले रही है देशी भाषा मे एक कहावत है “मरता क्या न करता”सरकार से बगावत भी नही कर सकते और मजबूरी में काम भी नही छोड़ा जा रहा इधर मोबलाइजरों के हालात तो और भी खस्ता है जो सरकार की चाकरी बीते कुछ वर्षों से कर रहे हैं इन्हें तो 8-10 महीने से वेतन नही मिल पा रहा है ये तो रोजगार सहायकों की स्थिति से बद्दतर जीवन जी रहे हैं लाखों की तादाद में नियोजित सरकार के इस पेसे से पेसा का वो हालात हैं कि इस पेसे से कर्मचारी मुक्ति का मार्ग ढूढ रहे हैं।


वेतन न मिलने का हम कोई ठोस कारण नही ढूढ पाए हैं पर कमर्चारियों का कहना है कि वेतन ऊपर से ही नही आ रहा है।
तीन-तीन चार महीने से वेतन न मिलने के कारण ग्राम पंचायत सचिव और रोजगार सहायक कर्मचारियों की जिंदगी मुश्किल में है। वे अपनी मेहनत का उचित पारिश्रमिक पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार की अनदेखी के कारण उनके घरों में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
इन कर्मचारियों का कहना है कि वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए पंचायतों के विकास कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन समय पर वेतन नहीं मिलने से उनके परिवारों के सामने रोज़ाना की जरूरतें पूरी करने की दिक्कतें खड़ी हो गई हैं।

वेतन के पड़े लाले कैसे प्रबन्ध हो निवाले….

जरा सोंचिए एक ऐसा वर्ग जो सिर्फ वेतन पर आश्रित हो और उसे एक माह भी वेतन न मिले तो उसका व उसके घर की स्थिति क्या होगी?
ग्राम पंचायत सचिव और रोजगार सहायक की कार्यशैली ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वे मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का क्रियान्वयन करते हैं और ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में मदद करते हैं। लेकिन तीन महीने से वेतन में हो रही देरी से न केवल उनके मनोबल में कमी आई है, बल्कि पंचायतों के विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।
स्थानीय कर्मचारियों का कहना है कि विभागीय लापरवाही और वित्तीय संकट के कारण उनका वेतन लंबित पड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप उनके परिवारों की हालत खराब हो रही है। “हमारे परिवार को कैसे चलाएंगे? हमारी मेहनत का फल मिलना चाहिए, लेकिन तीन महीने से हमे कुछ नहीं मिला,” कुछ रोजगार सहायको ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।

क्षोभ से जूझते कर्मचारियों में बढ़ता आक्रोश….

वित्तीय संकट और घर की बदहाली किसी के भी रक्त में उबाल ला सकती है फिर सचिव और रोजगार सहायक कर्मचारियों कि क्या बिसात।
कुछ लोगों ने तो बताया की लगता है सरकार की इस नौकरी को छोड़कर कोई प्राइवेट नौकरी कर लें
इनके वेतन न मिलने से सिर्फ इनका जनजीवन भर नही प्रभावित हो रहा है बल्कि इनके बाजार हाट और जरूरत की सामग्री रखने वाले दुकानदारो के दुकान भी अब ताले का इंतेजार कर रहे हैं बेहतर है सरकार लाडली बहन योजना में जिस प्रकार से मासिक किश्त का भुगतान कर रही है ऐसे कर्मचारियों का दर्द भी देख ले ताकि पंचायत, सरकार और उनके घर के हालात बेहतर से बेहतर हो सके।कुछ ग्रामीणों से हमने प्रतिक्रिया ली उन्होंने कहा कि “सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। ये कर्मचारी हमारे गांवों में विकास का काम कर रहे हैं, और उनके हक का भुगतान नहीं करना उनके साथ अन्याय है,”।

इनका कहना है…

(कोई ठोस कारण नही दे सकते जैसे-जैसे फंड आएगा हम बिल लगाते जाएँगे, पंचायत कर्मियों का वेतन न आना एक दुःखद विषय और मुश्किल की घड़ी है,शिवम प्रजापति जिला पंचायत सीईओ)

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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