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विश्व की शीर्ष जलवायु संस्था समावेशन के मुद्दों पर गतिरोध में

विश्व की शीर्ष जलवायु संस्था समावेशन के मुद्दों पर गतिरोध में

पेरिस, 30 अप्रैल 2024: विश्व की शीर्ष जलवायु संस्था इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के आगामी रिपोर्ट्स को लेकर वैश्विक समुदाय में एक महत्वपूर्ण बहस जारी है। भारत, केन्या, सऊदी अरब, रूस और चीन समेत कई देश इस बात पर जोर दे रहे हैं कि IPCC के अगले मूल्यों की रिपोर्ट तैयार करने में वैज्ञानिकों को पर्याप्त समय और संसाधन मिलें ताकि वे कम संसाधन सम्पन्न देशों का सही और सार्थक योगदान सुनिश्चित कर सकें।

इन देशों का तर्क है कि कई विकासशील एवं कम संसाधन वाले देश, जिनके पास जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अध्ययन के लिए प्रगतिशील सुविधाओं और वित्तीय सहायता की कमी है, वे वैज्ञानिक शोध में पूरी सक्रिय भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए ये देश IPCC से और अधिक समय देने की मांग कर रहे हैं ताकि उनकी आवाज़ भी वैश्विक जलवायु नीति निर्धारण में सशक्त और प्रभावी हो सके।

IPCC की रिपोर्टें जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रभावों, जोखिमों और समाधान की दिशा तय करती हैं, जिनका अनुसरण अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक निर्णयों में किया जाता है। इसकी निष्पक्षता और समावेशन नीति विश्व समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हालांकि, कुछ विकसित देशों ने इस मांग पर आपत्ति जताई है कि रिपोर्ट्स के समय-सीमा में स्थगन से वैश्विक जलवायु कार्रवाई में देरी हो सकती है, जो पहले से ही संकटग्रस्त पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

IPCC के महासचिव ने बताया कि संस्था इस मुद्दे पर समन्वय कर रही है और सभी पक्षों की चिंताओं का संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि IPCC का उद्देश्य हर देश, विशेषकर कम संसाधन वाले देशों के वैज्ञानिकों को अपने अनुभव और डेटा साझा करने का समान अवसर प्रदान करना है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक एकजुटता और समर्पित प्रयास आवश्यक हैं, ऐसे में IPCC के सामने चुनौती है कि वह समावेशन को बढ़ावा देते हुए समय पर विश्वसनीय और प्रभावी रिपोर्ट जारी करे। इस गतिरोध से विश्व जलवायु नीति में सकारात्मक बदलाव के लिए महत्वपूर्ण संवाद शुरू हो चुका है, जो आने वाले महीनों में निर्णायक होगा।

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