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नई दिल्ली: डीपीडीपी कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को नोटिस; अनुमति की अनिवार्यता से न्यूज रूम पर संकट की आशंका

नई दिल्ली, दिल्ली: व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा से जुड़े डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम और उसके नियमों को लेकर समाचार जगत की चिंताएं सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई हैं। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने अदालत में कहा है कि यदि पत्रकारों को किसी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेने के लिए बाध्य किया गया, तो इससे समाचार संस्थानों का कामकाज प्रभावित होगा और न्यूज रूम बंद होने तक की स्थिति पैदा हो सकती है

मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में डीएनपीए की याचिका पर संज्ञान लिया। पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को नोटिस जारी किए हैं।

अनुमति की शर्त को लेकर चिंता

डीएनपीए की मुख्य चिंता यह है कि व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल और प्रकाशन पर लागू होने वाले नियमों का असर समाचार तैयार करने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। पत्रकारों को कई बार ऐसे विषयों की पड़ताल करनी होती है, जिनमें सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्य, दस्तावेज और संबंधित लोगों के बयान महत्वपूर्ण होते हैं।

यदि खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति आवश्यक हो जाती है, तो उन मामलों में परेशानी बढ़ सकती है जहां खबर में उजागर की जाने वाली जानकारी संबंधित व्यक्ति के हितों के विपरीत हो। ऐसी स्थिति में पत्रकारों के लिए तथ्यों की पड़ताल और उन्हें सार्वजनिक करना कठिन हो सकता है।

एसोसिएशन ने अदालत के समक्ष यह भी आशंका रखी कि इस व्यवस्था से खोजी पत्रकारिता और समाचार स्रोतों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस मामले में कानून की संबंधित धाराओं की व्याख्या और उनके वास्तविक प्रभाव पर अंतिम स्थिति अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

21 डिजिटल प्रकाशक एसोसिएशन में शामिल

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन में कुल 21 डिजिटल समाचार प्रकाशक शामिल हैं। इनमें अंबानी और अदाणी समूह से जुड़ी कंपनियां भी हैं। संगठन ने डिजिटल समाचार माध्यमों के कामकाज पर डाटा संरक्षण कानून और उसके नियमों के संभावित प्रभाव को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

डाटा सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल

इस मामले के केंद्र में व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन का मुद्दा है। एक ओर नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के माध्यम से जनहित के मुद्दों को सामने लाना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब उनके जवाब पर नजर रहेगी। आगे की सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि कानून के प्रावधानों का समाचार प्रकाशन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है और व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा के साथ पत्रकारिता की आवश्यकताओं में तालमेल कैसे बनाया जा सकता है।

फिलहाल, अदालत ने इस कानूनी चुनौती पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। मामले में आगे होने वाली कार्यवाही से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि डीपीडीपी कानून और उसके नियमों को लेकर समाचार प्रकाशकों की चिंताओं पर न्यायालय क्या रुख अपनाता है।

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