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ड्रोन डील से बढ़ा भारत-बांग्लादेश-चीन त्रिकोण का तनाव

तकनीक के जरिए कूटनीति

आधुनिक दौर में हथियार केवल युद्ध का साधन नहीं, बल्कि कूटनीतिक प्रभाव का जरिया भी बन चुके हैं। बांग्लादेश और चीन के बीच हुआ ड्रोन फैक्ट्री समझौता इसी रणनीति का उदाहरण माना जा रहा है।

सिर्फ खरीद नहीं, निर्माण की तैयारी

इस डील की खास बात यह है कि इसमें पूर्ण तकनीकी सहयोग शामिल है। पहले ड्रोन असेंबल होंगे, फिर निर्माण और अंततः स्वदेशी डिजाइन तक पहुंचने की योजना है। यह बांग्लादेश के रक्षा क्षेत्र के लिए बड़ा बदलाव है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर की रणनीतिक अहमियत

सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की ‘चिकन नेक’ कहलाता है। इसकी सुरक्षा भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। ऐसे में पास ही चीनी तकनीक से लैस ड्रोन फैक्ट्री भारत को रणनीतिक असहजता में डालती है।

चीन का क्षेत्रीय विस्तार

चीन पहले ही श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में अपनी मौजूदगी बढ़ा चुका है। अब बांग्लादेश में ड्रोन फैक्ट्री को उसी श्रृंखला का हिस्सा माना जा रहा है।

बांग्लादेश की सैन्य आत्मनिर्भरता

बांग्लादेश एयर फोर्स का कहना है कि यह परियोजना देश को यूएवी सेक्टर में आत्मनिर्भर बनाएगी। लगभग 608 करोड़ टका की लागत से बनने वाली फैक्ट्री 2026 के अंत तक शुरू हो जाएगी।

भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया

भारत के लिए यह सिर्फ सीमा सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी क्षेत्र की रणनीति से जुड़ा मामला है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अब बांग्लादेश के साथ रक्षा और कूटनीतिक संवाद को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।

निष्कर्ष

ड्रोन फैक्ट्री समझौता तकनीक, राजनीति और रणनीति का संगम है। आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन किस दिशा में जाएगा।

Divya Kirti
Author: Divya Kirti

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